अगाध श्रद्धा के चलते ज्योंर्तिलिग नगरी ओकारेश्वर में नहीं होता रावण दहन

मयंक शर्मा
खंडवा २५ अक्टूबर ;अभी तक; कोरोना संक्रमण के खतरे को देखते हुये कई स्थानो पर ं दशहरा पर रावण दहन नहीं होगा लेकिन ज्योंतिर्लिग नगरी ओंकारेश्वर में दशहरा बगैर रावण दहन के मनाए जाने की परंपरा है। यहां भगवान भोलेनाथ के परम भक्त रावण का पुतला दहन नहीं होता है। इस दिन भगवान ओंकारेश्वर पालकी में सवार होकर नगर भ्रमण दौरान भक्तों को आशीर्वाद देने गर्भ गृह से निकलेगें वही ंराज परिवार द्वारा खेड़ापति हनुमान मंदिर में अस्तरे के पेड़ की पूजा के बाद दहशरा मनाया जाता है।
                      राज परिवार के राव देवेन्द्रसिंह ने बताया कि महादेव के परम भक्त होने से शिव र्की नगरी के आसपास दस किलोमीटर क्षेत्र में रावण, मेघनाथ और कुंभकरण के पुतले नहीं जलाने की परंपरा का निर्वाह क्षेत्रवासी बरसों से कर रहे हैं। ओंकारेश्वर के पंडा संघ अध्यक्ष पंडित नवल किशोर शर्मा का कहना है कि रावण भगवान शिव का अनन्य भक्त था, इस कारण रावण के साथ ही कुंभकरण-मेघनाथ के पुतले भी नहीं जलाए जाते। यह परंपरा क्षेत्र में प्राचीन समय से चली आ रही है। इसे सभी निभा रहे हैं।
                   ओंकारेश्वर मंदिर के आशीष दीक्षित ने बताया कि दशमी पर शाम में मंदिर परिसर में पूजा पाठ व आरती के बाद ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग की सवारी नगर भ्रमण करेगी जो शिवपुरी के मुख्य बाजार से होती हुई खेड़ापति हनुमान मंदिर पहुंचेगी, यहां अस्तरे के पेड़ की पूजा के बाद राज परिवार के सदस्यों के साथ नगर की जनता राजमहल जाएंगे। इसके बाद नगर में दशहरा पर्व मनाया जाएगा। बताया जाता है कि करीब सात वर्ष पहले परंपरा के विरुद्ध ओंकारेश्वर से सटे ग्राम शिवकोठी में कुछ युवाओं द्वारा रावण दहन करने से यहां विवाद की स्थिति बन गई थी। गांव में दो गुट हो गए थे। इसके बाद से कभी गांव में रावण दहन नहीं हुआ।
ओंकारेश्वर क्षेत्र पर भील राजा मांधाता का आधिपत्य रहने की वजह से भी यहां रावण नहीं जलता है। गौड समाज तो साल में एक बार मेधनाथ मेला आयोजित कर उसे पूजते है।
                  कुछ आदिवासी समुदाय मेघनाथ को अपना आराध्य मानते है इसलिये रावण परिवार के किसी सदस्य का दहन नहीं करते हैं।

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