अनुकरण और प्रोत्साहन बुराईयों का विस्तार देता है -जैनाचार्य श्री विजयराजजी म.सा.

महावीर अग्रवाल
मन्दसौर ११ नवंबर ;अभी तक; व्यक्ति प्रेम और विश्वास की कमी के कारण बुरा बन जाता है, बुराई स्वछंद होती है उसका प्रवेश कही पर भी हो जाता है। बुराई करने वाला तो बुरा होता ही है मगर बुरे व्यक्ति से घृणा करना भी बुराई से कम नहीं होता। घृणा पाप से होनी चाहिए न कि पापी से। पापी के जीवन मे कभी भी परिवर्तन आ सकता है। बुद्धिमान व्यक्ति कभी भी पापी से घृणा नहीं करते बल्कि वे उसे सुधरने का मौका देते है। संघर्ष और आलोचना से कभी व्यक्ति में सुधार नहीं आता, सुधार के लिए प्रेम और विश्वास का ही सहारा लिया जाना चाहिए, प्रेम और विश्वास में वो शक्ति है जिससे बुरे से बुरे व्यक्ति में परिवर्तन लाया जा सकता है। प्रेम से खूनी मुनि तथा डाकू साधु बन जाते है। घृणा, नफरत और आलोचना ये बुरे व्यक्ति को ओर मजबूत बनाते है। बुराई मनुष्य की दुर्बलता है स्वभाव नहीं, अगर स्वभाव होता तो सारे मनुष्य ही बुरे होते, मगर ऐसा न कभी हुआ है न कभी होगा कि सारे मनुष्य बुरे हो जाए, अच्छाई बुराई सापेक्ष होती है, जो बुराई को बुरा मानता है वह बुराई से जल्दी मुक्त हो सकता है, बुराई को अच्छाई मानने वाला बुराई से मुक्त नहीं हो सकता।
ये विचार शास्त्री कॉलोनी स्थित नवकार भवन में विराजित जैनाचार्य श्री विजयराजजी म.सा.  ने ‘‘घृणा किससे करें पाप या पापी से’’ इस विषयक परिचर्चा को प्रसारित करते हुए कहें। आपने कहा-अनुकरण और प्रोत्साहन बुराई को विस्तार देने में सक्षम कारण है, इनकी उपस्थिति में साधारण बुराई भी असाधारण रूप धारण कर लेती है। आग को अगर ईंधन न मिले तो स्वतः ही बुझ जाती है। ईंधन की तरह प्रोत्साहन बुराईयों को फलने, फूलने और फैलने में माध्यम बनती है। अनुकरण अच्छाईयों का भी होता है और बुराईयों का भी। अच्छा अनुकरण और प्रोत्साहन समझदार लोग करते है जो कम समझ रखते है वे बुराईयों का अनुकरण करके अपने दामन में बुराईयों को भर लेते है। पहले पहल बुराई करते समय व्यक्ति को घृणा होती है, दूसरी बार संकोच, तीसरी बार में व्यक्ति निःसंकोच हो जाता है। फिर उसका साहस बढ़ जाता है, यह बुराई के पनपने का विज्ञान है, अगर पहली बार ही थप्पड़ लग जाता है तो दूसरी बार उसका हौंसला नहीं बढ़ता। प्रोत्साहन करके ही व्यक्ति में बुराईयों के लिये मजबूती प्रदान कर दी जाती है। बुरा काम वही है जिसे करने के बाद छुपाना पड़े। छुपाया जाय वो सब बुरा काम होता है।
आचार्य श्री ने कहा- जो दूसरों के बुरा करने में अपना बुरा देखने लग जाता है वह बुराई से बच जाता है। अक्सर व्यक्ति दूसरों की बुराई देखता है मगर उसमें अपना बुरा नहीं देख पाता। इसी से वह बुराई को साथ देता हुआ बुरा बन जाता है। अपनी बुराई मिटाने के लिये संकल्प के सिवाय दूसरा कोई रास्ता नहीं है। बदलाव के लिए अच्छाई के प्रति आस्था पैदा होनी चाहिए। आस्था से आशा और आत्मविश्वास का भाव जागृत होता है। आत्मविश्वास से दृढ़, इच्छा शक्ति तैयार होती है। जो स्वयं में मजबूत होता है उस पर दूसरों की बुराई का असर नहीं होता है। कमजोर मन वाले जल्दी से बुराईयों का शिकार हो जाते है। गलत कार्य करने में लज्जा का अनुभव करने वाला सदैव बुराईयों से बचता रहता है। अपने में सजग रहना ही साधना है। साधक अच्छाई के प्रति सजग और बुराई के प्रति प्रमत्त होते है।

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