अपनी तुलना दूसरों के साथ करना ही मानव की नासमझी है -जैनाचार्य श्री विजयराजजी म.सा.

महावीर अग्रवाल
मन्दसौर। मानव के जीवन की समस्त उलझनों का आधार तुलना है। अतुलनीय होकर भी मानव अपनी तुलना हर किसी से करने लग जाता है। तुलना पर खरे न उतरने पर वह अशांत, उद्विग्न और परेशान होता है। हर समस्या का समाधान और कहीं नहीं बस उसकी इस तुलना की आदत के बदलाव में छिपा हुआ है। प्रकृति और पशु-पक्षियो में केाई तुलना नहीं होती इसीलिए उनमें केाई उलझन नहीं-तनाव नहीं वे अपना सहज जीवन जीते हे। मानव बुद्धिमान होकर भी अशांत जीवन जीता है यही सोचने को मजबूर करता है, क्यों वह अशांत हेाता है- अगर किसी ने वह तुलना न करें तो उसे कोई भी अशांत नहीं कर सकता। तुलना केवल कद से नहीं होती वह तुलना करता है-पद से, प्रतिष्ठा व पैसे से! कोई अगर उससे इनमें अधिक होता है वह उसे असहनीय हो जाता है, यह असहनीयता उसे क्रूर, हिंसक और निष्ठुर बना देती है, इसके चलते वह मानवता की सारे हदें पार कर दानवता के शिकंजे में फंस जाता है जो उसका ही नुकसान करती है।
ये विचार प्रखर वक्ता जैनाचार्य श्री विजयराजजी म.सा. ने नवकार भवन में प्रसारित अपने मंगल संदेश में कहे। आपने कहा-एकमात्र मानव ही इस धरातल पर ऐसा प्राणी है जो स्वयं को दूसरों से तोलता रहता है, छोटा बड़ा व्यक्तित्व करने की कोशिश करना मानव के क्षुद्र मन का लक्षण है। क्षुद्र प्रकृति का मानव ही स्वयं को बड़ा नहीं करता किन्तु दूसरों को छोटा करने में लगा रहता है। वह सोचता है जब दूसरे सब छोटे हो जायेंगे तो उनकी तुलना में मैं बड़ा हो जाऊंगा, यह क्षुद्र मनोवृत्ति ही उसके भीतर में ईष्र्या, प्रतिस्पर्धा और प्रतिद्वंद्विता पैदा करती है, परिणाम यह निकलता है न वह स्वयं को बड़ा बना पाता है और न दूसरों को छोटा कर पाता है। इस उधेड़बुन में वह अपनी शक्ति, श्रम, समय को लगाकर अपने पुण्य को क्षीण करता जाता है। क्षुद्र मनोवृत्ति कभी किसी का उद्धार नहीं करती।
आचार्य श्री ने कहा-तुलना का मूल कारण शक्ति की आकांक्षा में छिपा है, हर मानव यह सोचता है-कैसे मैं दूसरों से शक्तिशाली बनूं ? इस आकर्षण और आकांक्षा का द्वन्द्व ही मानव को तुलना के मैदान में खड़ा करता है। यह निश्चित है-मानव जैसा समझदार कोई नहीं है तो मानव जैसा नासमझ भी कोई नहीं है। अगर वह दूसरों के साथ अपनी तुलना करता रहेगा तो वह कभी भी शांति की साँस नहीं ले सकता। शांति कहीं नहीं समता भावों में शांति बसती है। तुलना का भाव भी मोह है और मोह से राग-द्वेष पैदा होते है। ये राग-द्वेष फिर आसक्ति के बंधन में बांधते है। अनासक्त भाव कब पैदा होते है जब हम जैसे है वैसा अपने को स्वीकार कर लेते है। जैसे ही तुलना में उतरते है- राग-द्वेष का सिलसिला चल पड़ता है। तुलना के भाव ही फिर व्यक्ति की बुद्धि को स्थिर नहीं रहने देते, अस्थिर बुद्धि मन को चंचल बनाती है, चंचलता हर समस्या का मूल बन जाती है। अगर शांति-समाधि-संतुष्टि चाहते है तो एक मात्र अपनी तुलना दूसरों के साथ करना बंद कर दे। सौ समस्याओं का समाधान इस एक सोच से मिल सकता है।

 

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