अब अच्छे लोकतंत्र के लिए लड़ना होगा अन्यथा लोकतंत्र लहू तंत्र में बदल जाएगा* रमेशचंद्र चंद्रे 

महावीर अग्रवाल
मंदसौर ४ मई ;अभी तक;  पश्चिम बंगाल हो या दक्षिण भारत के वामपंथी बाहुल्य राज्य यहां लोकतंत्र के मायने बदलते जा रहे हैं ,वहां एक बुरा लोकतंत्र विकसित हो रहा है और लोकतंत्र लहू तंत्र में बदलता जा रहा है! अलगाववादी हिंदू और मुसलमान तथा वामपंथी विचारधारा के आतंकवाद की राजनैतिक पराजय जब तक नहीं होगी तब तक देश की एकता एवं अखंडता पर खतरा मंडराता रहेगा l यहां यह स्मरण रखना चाहिए कि 1945- 46 के चुनाव में अलगाववाद की मानसिकता एवं इनकी राजनीतिक विजय के कारण ही भारत का विभाजन हुआ अतः अलगाववाद एवं आतंकवाद समाप्त करने के लिए उनकी राजनीतिक पराजय होना आवश्यक है ।
    उक्त बात शिक्षाविद श्री रमेशचंद्र चंद्रे ने एक बयान में कही । उन्होंने कहा कि     अलगाववाद की राजनीतिक पराजय का मतलब तुष्टीकरण की नीति को बढ़ावा देने वाले देश के वह हिंदू जो  अहिंदू मानसिकता के हैं उनकी पराजय  भी होना चाहिए ।  जिस कांग्रेस ने मुस्लिम तुष्टिकरण एवं अलगाववाद को बढ़ावा दिया उसी कांग्रेस के प्रवक्ता और नेता श्री गाडगिल की पुस्तक में आया यह उल्लेख कि, कांग्रेस को अपनी धर्मनिरपेक्षता की नीति में पुनर्विचार और पुनरीक्षण करना चाहिए , इससे स्पष्ट है की राजनीतिक सत्ता हथियाने के चक्कर में धर्मनिरपेक्षता के नाम पर जिस तरीके का भ्रम फैलाया जाता है और राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं की पूर्ति की जाती है वह इस देश के लोकतंत्र के लिए प्रारंभ से ही खतरनाक है ।
      कुछ राजनीतिक दल यह भ्रम फैलाते हैं कि यदि भारत में हिंदुत्व वादियों की सरकार आएगी तो  अल्पसंख्यकों पर अत्याचार बढ़ेंगे किंतु वस्तु स्थिति यह  है कि जिन जिन राज्यों में हिंदुत्ववादी सरकारे रही है, वहां मुसलमानों पर अत्याचार तो छोड़ो ,किंतु शासकीय एवं  सामाजिक स्तर पर भी किसी प्रकार का भेदभाव भी नहीं किया गया है और यह दृश्य यदि ईमानदारी से देखा जाए तो ” हिंदुत्ववादी संगठन अल्पसंख्यकों के दुश्मन हैं “इस आरोप की हवा निकल जाएगी।
    उन्होंने कहा कि      अलगाववाद की राजनीतिक पराजय से एक लाभ होगा कि देश के एक और विभाजन का खतरा टल जाएगा ,क्योंकि जब तक अलगाववाद एवं आतंकवाद फलता फूलता रहेगा तब तक विभाजन का खतरा देश के समक्ष बना रहेगा क्योंकि पहले का विभाजन भी अलगाववाद के कारण ही हुआ था।इसलिए  अलगाववादी संगठन एवं उसके नेताओं की राजनीतिक पराजय से देश में राष्ट्रवाद प्रबल होगा और विदेशियों से हाथ मिला कर देश को  हानि पहुंचाने वाली  ताकतें जो सत्ता में रहकर भी देश को नुकसान पहुंचाने का काम करती है वह कमजोर पड़  जाएगी  और उनके कारण भारत विभाजन के खतरे भी हमेशा के लिए टल जाएंगे।
              इसलिए अलगाववाद आतंकवाद एवं भारत में रहकर दूसरे देशों के प्रति निष्ठा रखने वाले तथा  उनके लिए स्वयं पैसा लेकर अपने देश को कमजोर करने वाले  लोगों  तथा  राजनीतिक दलों  की उपेक्षा करने से ही देश की एकता एवं अखंडता  कायम रह सकती है।