अमृत जैसा ज्ञान भी विनय के अभाव में वरदान की बजाय अभिशाप बन जाता है- मूनिश्री श्री कमलेश

6:04 pm or July 21, 2022

महावीर अग्रवाल

मंदसौर २१ जुलाई ;अभी तक;  अमृत जैसा ज्ञान भी विनय के अभाव में वरदान की बजाय अभिशाप के रूप में परिवर्तित हो जाता है। विनय की नींव पर ही साधना की मंजिल खड़ी की जा सकती है, क्योंकि विनय ही धर्म का प्रवेश द्वार है। इसलिए विश्व के सभी धर्मों में विनय को सर्वोपरि स्थान दिया है। ये विचार राष्ट्र संत कमलमुनि कमलेश ने जैन दिवाकर प्रवचन हाल में व्यक्त किए। संतश्री ने कहा कि विनय के द्वारा अर्जित किया गया बूंदभर ज्ञान भी सागर के रूप में परिवर्तित हो जाता है। विनय विकास का मार्ग है और अहंकार दुर्बुद्धि को पैदा करता है ये आत्मा को मलिन बनाता है। वहीं ज्ञान का सच्चा श्रृंगार भी विनय ही है। इसके द्वारा गुरु और भगवान तक को वश में किया जा सकता है।

                 संतश्री ने कहा कि कितनी ही कठोर साधना कर लें, दान करें या तीर्थ यात्रा कर लें, विनय के बिना सार्थक और सफल नहीं हो सकता है। धर्मसभा में श्री गौतम मुनि जी ने भी अपने विचार व्यक्त किए।

मुनिश्री के चातुर्मास काल में अखिल भारतीय जैन दिवाकर विचार मंच नई दिल्ली के वरिष्ठ कार्यकर्ता पारसमल जैन चारों महीना गुरुदेव की सेवा में परिवार और व्यापार से निवृत्त होकर समर्पित हो गए हैं। युवा तपस्वी हितेश जैन खिलचीपुरा के आज 11 उपवास है, आपने 31 उपवास के पचकान लिए है। आचार्य सम्राट आनंद ऋषि जी महाराज साहब की जयंती पर सप्त दिवसीय कार्यक्रम की रूपरेखा तैयार की जा रही है।