अहंकार से बचो, अहंकार पापकर्म करने की ओर प्रवृत्त करता है- आचार्य श्री पियुषभद्रसूरिश्वरजी म.सा.

5:29 pm or September 23, 2022
महावीर अग्रवाल
मन्दसौर २३ सितम्बर ;अभी तक;  लंका नरेश रावण विद्वान था, ज्ञानी था उसमें वे सभी गुण थे जो कि योग्य शासक में होने चाहिए लेकिन मात्र एक अवगुण के कारण उसका अन्त हुआ। अहंकार में आकर उसने पर स्त्री का हरण किया तथा उसे बन्दी बनाकर रखा। रावण के अहंकार के कारण उसके पूरे वंश का पतन हुआ। दुर्योधन ने भी अहंकार में आकर पाण्डवों का राज्य व उनकी सम्पत्ति छीन ली थी, वह उन्हें सूई की नौक के बराबर भूमि देने को तैयार नहीं था। अहंकार के कारण महाभारत का युद्ध हुआ और दुर्योधन को अपने सगे भाईयों के साथ प्राण गंवाने पड़े।
                                उक्त उद्गार परम पूज्य जैन आचार्य श्री पियुषभद्रसूरिश्वरजी म.सा. ने नईआबादी स्थित आराधना भवन उपाश्रय में आयोजित धर्मसभा में कहे। आपने शुक्रवार को मान कसाय अर्थात अहंकार के परिणाम विषय पर व्याख्यान में कहा कि सज्जनों को अपना स्वभाव कभी नहीं छोड़ना चाहिये। जिस प्रकार पानी अग्नि के सम्पर्क में आता है तो उसका स्वभाव जो शीतलता है वह बदल जाता है और वह गर्म हो जाता है। गर्म होने के दौरान पानी का कुछ अंश भी भाप के रूप में समाप्त हो जाता है। इसी प्रकार यदि सज्जन व्यक्ति भी अपना गुण छोड़कर अहंकार के अवगुण को अपना लेते है तो उनकी भी दुर्दशा होती है। लंका नरेश रावण ने पतिव्रता स्त्री सीता का हरण किया उसे लंका की अषोक वाटिका में बंदी बनाकर रखा। परस्त्री के हरण के पाप के कारण रावण जो ज्ञानी विद्वान था उसे पूरे संसार में अपयश का पात्र बनना पड़ा। इसलिये जीवन में कभी भी अहंकार में आकर ऐसा कृत्य मत करो कि तुम्हे अपयश का पात्र बनना पड़े। यदि रावण जिसका स्वभाव ज्ञानी व विद्वता का था वह उसे नहीं छोड़ता तो वह भी अपयश का पात्र नहीं बनता। आपने कहा कि संसार में सदैव गुणों एवं गुणगान व्यक्तियों की पूजा होती है। एक अवगुण भी सारे गुणों पर पानी फेर सकता है इसलिये जीवन में मान कसाय अर्थात जो अहंकार का अवगुण है उसे अपने हृदय में स्थान न दे।
पापकर्म की अनुमोदना से बचे- आचार्य श्री पियुषभद्रसूरिश्वरजी म.सा. ने कहा कि जीवन में हमें किसी भी पापकर्म की अनुमोदना से भी बचना चाहिये। जो व्यक्ति पापकर्म भले ही  नही ंकरे लेकिन वह यदि पापकर्म की अनुमोदना भी करता है तो उसे नरकगति में जाना पड़ता है इसलिये पापकर्म की अनुमोदना नहीं करना चाहिये।
क्रोध से घर की शांति समाप्त हो जाती है-आचार्य श्री ने कहा कि जिस घर में रोज झगड़े होत है, घर के सदस्य एक दूसरे पर क्रोध करते है, उस घर परिवार की शांति समाप्त हो जाती है। अपने घर परिवार में सुख समृद्धि रखना है तो सर्वप्रथम क्रोध को जीतो।
क्रोध में कोई निर्णय मत लो- आचार्य श्री ने कहा कि क्रोध में लिया गया निर्णय उचित व हितकारी नहीं होता है। महान शासक नेपोलियन बोनापोर्ट जिसने कई युद्ध लड़ेे वह कोई भी निर्णय क्रोध में नहीं लेता था। जो भी निर्णय लो सोच समझकर लो क्योंकि क्रोध में व्यक्ति सोचने समझने की क्षमता खो देता है। धर्मसभा में श्रावक श्राविकाओं ने आचार्य श्री की अमृतमयी वाणी का धर्मलाभ लिय। धर्मसभा के पश्चात श्रीसंघ की ओर से प्रभावना वितरित की गई। धर्मसभा में बड़ी संख्या में धर्मालुजन उपस्थित थे।