आज पराक्रम दिवस- सुभाष चंद्र बोस के नेतृत्व में सरकार बनती तो भारत का मानचित्र अखंड होता

5:37 pm or January 22, 2023


महावीर अग्रवाल 

मन्दसौर  २२ जनवरी ;अभी तक;  नेताजी सुभाष चंद्र बोस एक महामानव थे, वे चाहते तो उस समय अपना जीवन सुखमय तरीके से बिता सकते थे क्योंकि वह स्वयं उच्च शिक्षित बुद्धिमान और गुणवान व्यक्ति थे तथा पारिवारिक दृष्टि से भी बहुत संपन्न एवं प्रतिष्ठित थे किंतु सामान्य व्यक्ति सुख सुविधा एवं आराम की जिंदगी बिताने में ही अपना जीवन सफल मानता है परंतु नेताजी प्रारंभ से ही देश सेवा के संकल्पों का ताना-बाना बुनते रहते थे उनका त्याग, साहस एवं व्यक्तित्व इतना उच्च कोटि का था की जिसे देखकर हजारों व्यक्ति उनके सामने अपना सर्वस्व अर्पण करने को तैयार हो जाते थे, क्योंकि उनके वक्तव्य और भाषणों में उनके जीवन का आचरण भी प्रकट होता था।
                                   23 जनवरी 1893 को उनका जन्म उड़ीसा के कटक नामक स्थान पर हुआ था जबकि वह मूल निवासी बंगाल के थे इनके पिता श्री जानकीनाथ अंग्रेजी शिक्षा के बहुत पक्षधर थे और इसीलिए उन्होंने अपने सभी बच्चों को यूरोपियन स्कूल में शिक्षा दिलवाई और बाद में भी यूरोप भेजकर उनकी शिक्षा का प्रबंध किया। सुभाष ने बी.ए. पास करने के बाद आध्यात्मिक गुरु की खोज करने के लिए विभिन्न तीर्थ स्थलों की यात्रा भी की किंतु प्रवचन एवं आचरण के अंतर को देखकर उन्होंने निष्कर्ष निकाला कि- ‘‘केवल मुख से कही गई बात एक सिद्धांत मात्र होती है पर जब उसे व्यवहार में लाया जाता है तब वह सत्य होता है।’’
                                         इस प्रकार सुभाष की मनोवृत्ति का झुकाव सांसारिक धन, वैभव और पद के बजाए जीवन की वास्तविकता को जानने और अपनी शक्ति तथा सामर्थ्य का उपयोग देश की स्वतंत्रता एवं उसकी प्रगति करने की तरफ होने लगा उनके मित्र उनको सन्यासी के नाम से पुकारने लगे। जब वे कोलकाता के प्रेसीडेंसी कॉलेज में बी.ए. कर रहे थे उस समय एक अंग्रेज प्रोफेसर ने एक भारतीय छात्र को गालियां दी तो सुभाष को यह सहन नहीं हुआ और उन्होंने उस प्रोफेसर के विरुद्ध कॉलेज में हड़ताल करवा दी जिसके कारण उन्हें कॉलेज से निकाल दिया गया बाद में उस समय के कलकत्ता यूनिवर्सिटी के वाइस चांसलर श्री आशुतोष मुखर्जी के प्रयत्न से उन्हें फिर स्कॉटिश चर्च कॉलेज में पढ़ने की अनुमति मिली और सन 1918 में उन्होंने बीए पास करके एमए में प्रवेश लिया। उसके पश्चात विलायत जाकर उन्होंने इंडियन सिविल सर्विस की परीक्षा पास की जिसके कारण सुभाष अंग्रेजी सरकार में भी किसी ऊंचे पद पर नियुक्त हो सकते थे किंतु वे सरकारी नौकरी के लिए बिल्कुल तैयार नहीं थे। वे भारत के पहले व्यक्ति थे जिन्होंने आईसीएस की परीक्षा अच्छे अंको से उत्तीर्ण करके भी प्रशासनिक सेवा को स्वीकार नहीं किया।
एक दिन लंदन में इंडियन मजलिस में श्रीमती नायडू का ओजस्वी भाषण सुनकर वे भाव विभोर हो गए और मन ही मन उन्होंने स्वतंत्र संग्राम में भागीदारी करने का निश्चय कर लिया उस समय बंगाल के नेता चितरंजन दास थे जिन्होंने लाखों रुपए की आमदनी वाली बैरिस्टरी त्यागकर गांधीजी के असहयोग आंदोलन में भाग लिया था उस समय बंगाल में क्रांतिकारियों का आंदोलन अपनी चरम पर था।
                           श्री सुभाष एक दैनिक समाचार पत्र के संचालक के रूप में नियुक्त किए गए उन्होंने अपने पत्र के माध्यम से अंग्रेजी सरकार की नींद उड़ा दी इसके साथ ही वे स्वतंत्रता संग्राम में पूर्ण समर्पण के साथ लग गए और बंगाल के गांव-गांव में जाकर जन जागरण करने लगे उनके ओजस्वी भाषण और विचारों का प्रभाव कुछ ऐसा पड़ा की जनता और विशेषकर युवा लोग विशेष रुप से सुभाषचंद्र बोस के अनुयायी बन गए तथा अंग्रेजी सरकार की जड़े हिलाने के काम में संलग्न हो गए।
                               इस प्रकार सुभाषचंद्र एक प्रसिद्ध राजनेता बन गए उसी समय कांग्रेस के द्वारा एक वॉलिंटियर सेना बनाई गई थी उसके वे अध्यक्ष नियुक्त किए गए इस वॉलिंटियर्स सेना ने सुभाषजी के नेतृत्व में उत्तरी बंगाल में बाढ़ के समय जबरदस्त सेवा कार्य किया उसका प्रभाव वहां के जनमानस पर बहुत अच्छा पड़ा और वह सुभाष के भक्त बन गए सुभाष ने किसानों का एक संगठन बनाया जो गांव में तालाब बनाने, कुआं खोदने, पेड़ लगाने एवं खेती के नए तरीकों के लिए कार्य करने का काम करता था।  इस प्रकार के सेवा कार्य करते हुए वे क्रांतिकारियों को गोला, बारूद, पिस्तौल इत्यादि हथियार की व्यवस्था भी करते थे जिसकी जानकारी अंग्रेजी सीआईडी को हो जाने के कारण उन्हें गिरतार कर बर्मा की मांडले जेल में भी रखा गया।
अंग्रेजों की अनीति एवं अन्यायपूर्ण तथा दमनकारी शासन प्रणाली के समक्ष अहिंसक आंदोलन में उनकी रूचि बिल्कुल भी नहीं थी फिर भी एक आंदोलनकारी के रूप में महात्मा गांधी के प्रति उनका सम्मान एवं श्रद्धा कम नहीं थी इसी प्रकार राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ में सम्मिलित होने का आमंत्रण भी उन्हें दिया गया किंतु उन्होंने संघ से जुड़ने से यह कहकर इंकार कर दिया कि संघ का बताया हुआ मार्ग समाज को संगठित करने के लिए बहुत उत्तम है किंतु मैं राजनीति में इतना आगे बढ़ चुका हूं कि अब संघ के साथ चलना ठीक नहीं होगा। किंतु अंग्रेजी सरकार को उखाड़ फेंकने के लिए उन्होंने जर्मन और जापान की मदद से एक आजाद हिंद फौज की स्थापना की और उन्हें एक विशेष वेशभूषा एवं हथियारों से सज्जित कर उनके प्रशिक्षण की समुचित व्यवस्था की गई। 5 जुलाई 1943 को द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान अंग्रेजो के खिलाफ लड़ने के लिए उन्होंने जापान के सहयोग से आजाद हिंद फौज की स्थापना कर सिंगापुर में उन्होंने अपने पहले भाषण में ही जय हिंद का नारा दिया और तुम मुझे खून दो मैं तुम्हें आजादी दूंगा इन नारो के साथ उन्होंने अंग्रेजों के विरुद्ध अपने इरादे स्पष्ट कर दिए थे।
21 अक्टूबर 1943 को आजाद हिंद फौज के सर्वोच्च सेनापति की हैसियत से उन्होंने स्वतंत्र भारत की अस्थाई सरकार बनाई जिसे जर्मनी, जापान, फिलीपींस, कोरिया, चीन, इटली और आयरलैंड सहित 11 देशों की सरकार ने मान्यता प्रदान की। 1942 में ही उन्होंने ऑस्ट्रिया की एक महिला एमिली के साथ जर्मनी के बाड़ गस्टिन नामक स्थान पर हिंदू पद्धति से विवाह कर लिया।
1944 में आजाद हिंद फौज ने अंग्रेजों पर आक्रमण कर कुछ भारतीय प्रदेशों को उन से मुक्त भी करा लिया था किंतु 1945 में ताइवान में उनकी तथाकथित विमान दुर्घटना में मौत हो गई।
नेताजी की मृत्यु को लेकर आज भी विवाद है तथा उनकी संदेहास्पद मृत्यु को लेकर तत्कालीन जवाहरलाल नेहरू की सरकार एवं इंदिरा सरकार के सामने भारत के विपक्ष ने और अनेक राष्ट्रीय संगठनों ने जांच की मांग की किंतु उक्त सरकारों ने इस पर कोई ध्यान नहीं दिया और आज भी उनकी मृत्यु पर सस्पेंस बना हुआ है तथापि भारत सरकार ने 23 जनवरी 2021 को पराक्रम दिवस के रूप में मनाने का निर्णय कर सुभाषचंद्र बोस को एक सच्ची श्रद्धांजलि देने का प्रयास किया है।
यूं तो भारत को स्वतंत्रता दिलाने में अनेक संगठनों का और शहीदों का प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष योगदान रहा है किंतु सुभाषचंद्र बोस की शैली इन सभी संगठनों एवं व्यक्तियों से बहुत भिन्न थी यदि सुभाषचंद्र बोस कुछ समय और जीवित होते तो भारत का मानचित्र आज के भारत से भी कहीं ज्यादा विशाल होता।
रमेशचन्द्र चन्द्रे