आज महाराणा प्रताप जयंती विशेष-मुगलों ने राजपूतों को भटकाया किंतु प्रताप ने सही रास्ता दिखाया

3:03 pm or June 1, 2022
(रमेशचन्द्र चन्द्रे)
              मुगलों के आने के पूर्व राजपूत समाज की सांस्कृतिक एवं धार्मिक पृष्ठभूमि अत्यंत ही मजबूत थी किंतु मुगल शासन में बादशाहो एवं छोटे छोटे शासकों द्वारा अनेक राजपूत राजाओं को भ्रमित कर सुरा, सुंदरी तथा विलासिता के मायाजाल में उलझा कर दिग्भ्रमित करने का प्रयास किया ताकि राजपूत शारीरिक और मानसिक दृष्टि से कमजोर हो जाए तथा किंकर्तव्यविमूढ़ की तरह मुगलों के प्रति समर्पित रहे और इसी तरह अंग्रेजों ने भी फूट डालकर वही सब काम किया जो मुगल शासकों द्वारा किया गया था तथा उन्होंने सत्ता हथियाने का षड्यंत्र इस तरह रचा कि राजपूत राजा उनके भी जाल में फंसते चले गए, जिसके कारण उनकी संस्कृति, धर्म और एकता की शक्ति को बहुत क्षति पहुंची किंतु राणा उदय सिंह और महाराणा प्रताप ने इस स्थिति को समझा तथा मुगल सम्राट अकबर की चाल में नहीं फंसे और निरंतर अकबर की सेना से संघर्ष करते-करते मेवाड़ के राज्य की स्वतंत्रता के लिए अपने सारे सुखों को न्यौछावर कर दिया अंततः महाराणा से अकबर भी युद्ध करते करते थक चुका था और उसने महाराणा प्रताप से युद्ध करना ही बंद कर दिया।
                       महाराणा प्रताप के उक्त संघर्ष और आजादी के प्रति समर्पण के भाव से संपूर्ण राजपूताना नई उत्साह की लहर से भर गये थे, आज जो राजस्थान सहित संपूर्ण भारत का अस्तित्व दिखाई दे रहा है उसका श्रेय महाराणा प्रताप को दिए जाने में कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी।
                  भारत में मुगलों के आने के पूर्व राजपूत समाज मदिरापान नहीं करता था किंतु मुगल बादशाहों ने इनको कमजोर करने के लिए अपने राजमहलों में बुला-बुलाकर गलत मार्ग में धकेलने प्रयास किए, जिसके कारण राजपूत राजाओं का चारित्रिक पतन भी हुआ और वह कमजोर भी हुए जिसका लाभ मुगलों ने उठाया और यही कारण रहा की महाराणा प्रताप ने इस तत्व को समझ लिया था और किसी भी मुगल बादशाह का आतिथ्य उन्होंने कभी भी स्वीकार नहीं किया।
महाराणा प्रताप के बारे में मुगल शासकों सहित अनेक राजपूत राजाओं ने यह भ्रामक प्रचार किया कि महाराणा प्रताप युद्ध से घबराकर जंगल में भाग गए हैं और घास की रोटियां खा रहे हैं जबकि यह सत्य नहीं है जब महाराणा प्रताप की सेना की शक्ति कमजोर हो रही थी ऐसी स्थिति में उन्होंने जंगलों में भूमिगत रहकर सेना का पुनर्गठन किया तथा भामाशाह सहित मेवाड़ के अनेक व्यापारियों की एक मीटिंग आयोजित कर उनसे धन संग्रह की अपील भी की गई और फिर से महाराणा ने अपनी सेना को खड़ा किया।
                     जब देश राजपूतों की झूठी शान एवं विलासी जीवन की वजह से अंधकार के गर्त में डूब रहा था और रणबांकुरो की तलवारे जंग खा रही थी, जब मेवाड़ सहित संपूर्ण राजस्थान बिखराव के कगार पर खड़ा था ऐसी कठिन परिस्थिति में प्रताप ने शासन की बागडोर संभाली और सिंहासन पर बैठते ही यह सिंह गर्जना की कि जब तक मेरी जान है तब तक मेवाड़ की शान पर कोई आंच नहीं आने दूंगा।
                  प्रताप का अपना सगा भाई शक्तिसिंह अकबर से जा मिला और अनेक राजपूत राजा तथा जमीदार मुगलों का साथ दे रहे थे इसके बाद भी महाराणा प्रताप का मनोबल कमजोर नहीं हुआ और हल्दीघाटी के युद्ध में जो वीरता का प्रदर्शन हुआ है वह विश्व इतिहास की एक बहुत ही स्वर्णिम घटना है। प्रताप के घोड़े चेतक का बलिदान देखकर इतिहासकारों ने लिखा है कि जहां के जानवर भी देशभक्त और स्वामी भक्त होते हो वहां की संस्कृति और स्वतंत्रता को हिलाया तो जा सकता है परंतु उसे समूल नष्ट नहीं किया जा सकता।
                    महाराणा प्रताप का जन्म जेष्ठ शुक्ल तृतीया विक्रम संवत 1597 तदनुसार 9 मई सन 1540 को हुआ था और बचपन से ही उनके जीवन में वीरता तथा स्वाभिमान के भाव प्रकट होने लगे थे। उनके पिता उदयसिंह जी ने भी अकबर से अनेकों बार युद्ध लड़े और युद्ध के मैदान पर उन्होंने प्रताप को शिक्षा देते हुए कहा कि हम क्षत्रिय पुत्र हैं हमें यह जीवन मातृभूमि की रक्षा करने के लिए मिला है यदि इसके लिए हमें सर्वस्व बलिदान भी करना पड़े तो हम पीछे नहीं हटेंगे। पिता के द्वारा वीरता तथा मेवाड़ की आजादी का संस्कार प्रताप की युवावस्था में काम आया और उन्होंने अपने जीवन में आजादी के महत्व को सिद्ध करके दिखा दिया।
                   आज महाराणा प्रताप की जन्म जयंती है ऐसे अनेक महापुरुष भारत की धरती पर त्याग और बलिदान की कथाएं लिख कर चले गए किंतु समाज के सामने उनका जीवन आज भी प्रकाश स्तंभ की तरह मार्गदर्शन करता है। उस जमाने में मुगलों के द्वारा राजपूतों को लक्ष्य से भटकाने के लिए मदिरापान का सहारा लिया गया था किंतु दुर्भाग्य है कि कुछ राजपूतों ने उसे अपनी जातिगत परंपरा तथा गर्व का विषय बनाया हुआ है किंतु आज की युवा पीढ़ी को ‘‘मदिरापान’’ करना अपनी खानदानी अथवा वंश परंपरा नहीं समझना चाहिए और उसका त्याग कर समाज की मुख्यधारा में अपने आप को समर्पित कर देना चाहिए ताकि महाराणा प्रताप जैसे महापुरुषों के त्याग एवं बलिदान का मान सम्मान कायम रह सके।