आदर्श दम्पत्ति ही आदर्श संतान के निर्माता होते है -जैनाचार्य श्री विजयराजजी म.सा.

महावीर अग्रवाल
मन्दसौर ३० अक्टूबर ;अभी तक; संतान का संस्कारी और सदाचारी होना गृहस्थ जीवन का सर्वोत्तम पुण्य व पुरूषार्थ है। संतान का होना ही पर्याप्त नहीं है उसका संस्कारी होना आवश्यक है। सब कुछ किया पर संतान को संस्कारी नहीं बनाया तो कुछ नहीं किया। आदर्श दम्पत्ति ही आदर्श संतान के निर्माता होते है। जिस दम्पत्ती में स्वयं में संस्कार नहीं होते वे संस्कारवान संतान की अभिलाषा पूर्ण नहीं कर सकते, संस्कारों की पहली पाठशाला घर होती है, जो संस्कार घर से प्राप्त होते है वे स्थायी और परिपूर्ण होते है। संस्कार विहीन संतान गृहस्थ जीवन का बोझ है, वह केवल भार वहन करता है पर आनंद का अनुभव नहीं कर सकता।
                      ये विचार शास्त्री कॉलोनी स्थित नवकार भवन में विराजित जैनाचार्य श्री विजयराजजी म.सा. ने प्रसारित संदेश में कहे। आपने कहा- सही अर्थों में देखा जाए तो अच्छी संतान ही अच्छी सम्पत्ति होती है, जिस पर भविष्य गर्व करता है बाकि सम्पत्ति तो नाशवान और कभी भी विपत्ति में बदल सकती है मगर अच्छी संतान पीढ़ि दर पीढ़ि गौरव को बढ़ाती हैं अच्छी संतान ही तन को साता और मन को समाधि प्रदान करती है जो कार्य सम्पत्ति नहीं कर सकती वह अच्छी संतान कर दिखाती है। अच्छी संतान को देखकर माता-पिता का सीना छप्पन इंच चौड़ा हो जाता है। पति समझदार हो तो मकान बन जाता है, पत्नी समझदार हो तो मकान घर बन जाता है। दोनों समझदार हो तो घर मंदिर बन जाता है और संतान समझदार हो तो घर स्वर्ग बन जाता है। संतान के समझदार होने पर ही घर स्वर्ग बनता है यह सच्चाई है। बच्चे समझदार बनते है-संस्कारों से। एक संस्कारों के अभाव में घर ही नरक नहीं बनता बल्कि जीवन नर्क बन जाता है।
                   आचार्य श्री ने कहा- आज की विडम्बना है-माता-पिता के पास बच्चों को देने के लिए सम्पत्ति है, साधन-सुविधाएं है मगर समय नहीं है, समय के अभाव में संतान संस्कार लेने कहां जायेगी, वह इधर-उधर से सीखेगी, जिसमें सार कम होगा कचरा अधिक होगा। बच्चों का मन कोमल होता है, मस्तिष्क उर्वर होता है, ग्रहण शक्ति ताकतवर होती है, माता-पिता अपनी संतानों का जितना समय और समझ देते है उतनी संतान प्रखर और प्रणत होती है। वहीं संतान सफल होती है जो बड़ों की छत्र छाया में पलती है, बड़ी होती है। बड़ों की छत्र छाया ही अनुभवों का खजाना देती है जिससे उत्तम और ऊर्जावान संतान का जीवन निर्माण होता है। संतान पर माता-पिता के अनंत उपकार होते है, उनसे उऋण होने के लिए संतान का दायित्व बनता है व अपने माता-पिता की सेवा में तन-मन जीवन समर्पित कर दे। संतान के लिए जितना माता-पिता सहन करते उतना वह नहीं करती उसका कुछ हिस्से में भी सहन कर लें तो आज के वृद्ध माता-पिता की बहुत सारी समस्याओं का समाधान मिल सकता है। सहिष्णु संतान अपने उपकारी माता-पिता के समर्पित रहकर उनके जीवन को उत्सव और मरण को महोत्सव बना देती है।

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