आदिवासी समाज मनाता है पूरे एक माह तक दिवाली

मयंक भार्गव

खंडवा १३ नवंबर ;अभी तक; भले ही पूरे देश में 14 नवंबर को दिवाली का त्यौहार मनाया जायेगा किंतु खंडवा जिले के आदिवासी अंचल के  गांवों में यह त्यौहार एक महीने तक अलग-अलग गांवों में मनाया जाता है।

आदिवासी पंरपरा के बारे मे समाज के ही  वासुदेव ने बताया कि आदिवासी का यह पर्व मुख्य दिवाली से लेकर ग्यारस के दिन तक लगातार चलता है. । वहीं कुछ क्षेत्रों में यह पर्व दिवाली से एक महीने तक मनाया जाता है, जिसको देखने शहरी क्षेत्रों से भी लोग देहातो में जाते है.

यह पर्व आदिवासियों के लिए किसी उत्सव से कम नहीं है.। आदिवासी गांव में गांव चराने वाले गायकी समुदाय के लोग पूरी रात्रि भर घरो पर गोधन निकालते हैं जिसमें गेरू और चूने का उपयोग किया जाता है।  ये घरों की दीवारों पर आकृति बनाते है, जिसके बदले में इन्हें पैसे और अनाज दिया जाता है।

दिवाली के दिन शाम को हर आदिवासी परिवार में नए अनाज की खिचड.ी बनाई जाती है. उसे सूपे में रखकर पूजा के बाद गाय बैलों को खिलाया जाता है।  यह त्यौहार आदिवासी समाज अपनी पुस्तैनी परंमराओं को जिंदा रखने के लिए 21 सदी में भी मना रहा है।  इस पर्व में नाते रिश्तेदारों को निमंत्रण देने के लिए चावल के दाने हल्दी से पीले कर घर जाकर दरवाजे पर रखे जाते हैं। उन्हें दिवाली में आने का निमत्रंण दिया जाता है. इस दौरान जगह-जगह मेलों का भी आयोजन किया जाता है।गांवों में वर्तमान में आदिवासी वर्ग धूमधाम से दिवाली का त्यौहार मना रहा है.

आदिवासी समुदाय के द्वारा तय की गई मान्यताओं के अनुसार समुदाय के हर गांव में अलग-अलग दिन दिवाली मनाई जाती है। इसमें दूर रहने वाले रिश्तेदारों को भी आमंत्रित किया जाता है,जिससे एक-दूसरे से मिलने-जुलने के बाद त्यौहार का आंनद और दोगुना हो जाता है।

इस त्यौहार पर आदिवासी लोग पूरी सिद्दत के साथ लक्ष्मी जी की पूजा करते हैं तथा दूसरे दिन गायों को सजाकर उन्हें मैदान में खिलाया जाता है. इस दौरान कईगांवों में बैलजोड.ी पट का भी आयोजन किया जाता है।

सामाजिक मान्यता के अनुसार आदिवासी समाज में सभी रिश्तेदारों को इस प्रमुख त्यौहार में शामिल करना इसका मुख्य उद्देश्य है.। ग्राम सुन्दरदेव के वासुदेव ने बताया कि  इस त्यौहार में  सभी नातेदार मिल-बैठकर त्यौहार का आंनद उठाते है.।  अलग-अलग दिन अलग-अलग गांव में दिवाली मनाई जाती है और सभी आदिवासी गांवों में यही प्रथा है.।
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उन्होने कहा कि मुख्य तौर से आदिवासियों द्वारा छोटे-छोटे ढानों में अलग-अलग दिन दिवाली मनाई जाती है.।
आदिवासी परंपरानुसार दिवाली पर दिनों के अंतराल से दिवाली मनाने की परंपर है.। आदिवासी दूसरे गांव के लोगों को अपने गांव की दिवाली के लिए आमंत्रण देते है और मेहमानों के मनोरंजन के लिए खासे इंतजाम करते है. जिसमें मुख्य रूप से नृत्य का आयोजन किया जाता है, इसमें आदिवासी डंडेर नृत्य से लोगों का मन मोह लेते है. वही आदिवासी पूरी रात ढोल-ढमाकों के साथ व्यंजन एवं आदिवासी परंपरानुसार मदिरा पान कर पूरी रात नृत्य का लुफ्त उठाते है.
वासुदेव ने बताया कि आदिवासी पटाखो को ज्यादा महत्व नहीं देते है और बहार से आए मेहमानों को उत्तम भोजन की व्यवस्था बनाकर उनका आदर सत्कार करते है.।

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