आर्जव भाव के अभाव में की गई क्रियाएं सार्थक नहीं होती -जैनाचार्य श्री विजयराजजी म.सा.

महावीर अग्रवाल
मंदसौर ;अभी तक; आर्जव का अर्थ है- सरलता, यह मनुष्य का स्वाभाविक गुण होता है, जिसकी मति और प्रकृति सरल होती है उसका कोई दुश्मन नहीं होता, न वह किसी का दुश्मन होता है न उसका कोई दुश्मन होता है। सरल प्रकृति वाला मनुष्य सबके साथ मैत्री भाव रखता है, मैत्री ही उसे महान बनाती है। सरल प्रकृति होने से उसके आचार और विचार में समता बनी रहती है, फलस्वरूप वह कभी संशय ग्रस्त नहीं हेाता न उससे कोई संशय ग्रस्त होता है, उसका जीवन और व्यवहार खुली पुस्तक के समान स्पष्ट व प्रत्यक्ष होता है। उसके चारों और प्रसन्नता, निश्चिंतता और सहजता का वातावरण बना रहता है। उसके लिये कोई लुकाव-छिपाव  वाली बात ही नहीं होती। सरल प्रकृति वाला मनुष्य जैसा सोचता है, वैसा बोलता है और वैसा ही कार्य करता है, उसको मन, वचन, काय की एकरूपता ही उत्तम धर्म में प्रतिष्ठित करती है।
                  ये विचार शनिवार को शास्त्री कॉलोनी स्थित नवकार भवन में विराजित जैनाचार्य श्री विजयराजी म.सा. ने प्रसारित संदेश में कहे, आपने कहा- आज का युग छल-छद्मों का युग है, इसमें चालाक लोगों की अहमियत होती है, मगर अधिक चतुर और चालाक मनुष्य स्वय में चैन से नहीं जीते, उन्हें हर समय कोई न कोई बैचेनी बनती रहती है, अपनी उस बैचेनी को छिपाने के लिये वक्रताएँ धारण करनी पड़ती है, वक्रता यानि कुटिलता में वह सोचता कुछ ओर है, बोलता कुछ ओर है जैसा सोचता है वैसा बोलता नहीं, और जैसा बोलता है वैसा करता नहीं, उसकी कथनी और करनी में बड़ा अंतर होता है, यही अंतर ही उसके लिये सारी परेशानियों का कारण होती है। ऐसा व्यक्ति क्रूर, निर्दयी और स्वार्थी होता है, उसका कोई मित्र नहीं होता, वह कब किसको धोखा दे दे इसका पता भी नहीं चलता वह आस्तीन का साँप बनकर दूसरों को हानि पहुंचाने की योजनाएं बनाने में व्यस्त रहता है, उसकी कार्य प्रणाली इतनी बनावटी और नकली लगने लगती है जिससे वह सबका विश्वास खो देता है, अविश्वास, संशय, विरोधाभास और कृत्रितमाएं ही उसकी प्रकृति व नियति बन जाती है।
               आचार्य श्री ने कहा-जिसके परिणाम सरल होते हैं वह सबका प्यारा बन जाता है, उसका हृदय इतना पवित्र और संवेदनशील होता है वह सबको अपनी खुशी बांटता है, सबसे प्रेम बटोरना अपनी खुशियां बांटना सरल प्रकृति के मानव की कुशलता होती है। सरल व्यक्ति की दृष्टि अपने दोषों और दूसरों के गुणों पर केन्द्रित होती है। फलस्वरूप वह सबके गुणों को ग्रहण करता हुआ गुणी-गुणारागी बन जाता है। प्रत्येक क्रिया व प्रवृत्ति में उसकी प्रज्ञा जागरूक और विवेकभाव प्रदीप्त रहता है, इस कारण अपनी गलती को शीघ्र स्वीकार कर उसका पश्चाताप व प्रायश्चित कर लेता है। पापों की ग्रंथियाँ नहीं बंधती जिससे वह निर्ग्रन्थ धर्म का आराधक बन जाता है। उसका एक ही सूत्र होता है, सरलता में सार है बाकि सब बेकार है।
आचार्यश्री ने कहा- सरलता के अभाव धर्म साधना व उच्च क्रियाकांड भी दिखावा बनकर रह जाते है, क्रिया करना, तप-जप करना, दान-पुण्य करना अच्छा है उसकी कोई बुराई नहीं कर सकता। इनके साथ आर्जव भाव रहने चाहिए। आर्जव भाव के अभाव में की गई क्रियाएं सार्थक परिणाम नहीं लाती, सार्थकता आर्जव भावों से आती है, क्रियाएं संख्या की दृष्टि से कम हो ज्यादा हो उसका उतना महत्व नहीं बिना दंभ, दिखावे और वक्रभावों के साथ की गई क्रियाएं कर्म मुक्ति-जीवन शुद्धि में सहायक होती है। सरलता आये, खानपान में सात्विकता आये, रहन सहन में सादगी, व्यापार-व्यवसाय में प्रामाणिकता आये तो जीवन सफल और सार्थक बनता है, ये सब आर्जव भावों की साधना से ही संभव है, सबका ध्यान इस ओर जाना चाहिए।

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