आसक्ति ही व्यक्ति को बैचेन बनाती है -जैनाचार्य श्री विजयराजजी म.सा.

महावीर अग्रवाल
मन्दसौर ९ सितम्बर ;अभी तक; । आसक्ति ही परिग्रह है, यह वस्तु, व्यक्ति, मान्यता और परम्परा किसी के प्रति हो सकती है, यह राग के वश होती है, राग का भाव ही व्यक्ति को आसक्त बनाता है, फिर वह उस आसक्ति की पूर्ति में अर्जन, संचय और संग्रहण के लिये निरंतर प्रयत्नशील रहता है। पर वस्तु में आसक्त बना व्यक्ति जब तक उसे वह वस्तु प्राप्त नहीं होती तब तक चैन नहीं मिलता, यह आसक्ति ही व्यक्ति को बैचेन बनाती है। इन बाह्य वस्तुओं के प्रति जितना आकर्षण बढ़ता जाता है, उतनी उसकी आसक्ति भी बढ़ती जाती है। आसक्ति कभी भी व्यक्ति को अपरिग्रही नहीं बनने देती। वह हर व्यक्ति को अपने बंधन में जकड़कर रखती हैं बाह्य पदार्थों पर स्वामित्व स्थापित करने के लिए और ऐसा करके अपने लोगों की सुख सुविधा बढ़ाने के लिये राष्ट्रों के बीच युद्ध तक हो जाते है। व्यापार विस्तार की प्रतिस्पर्धा एवं अपने उत्पादित वस्तुओं की बिक्री के लिए बाजारों की होड़ ही आज के विश्व की एक दुर्दान्त समस्या बनी हुई है। यह आसक्ति का ही विस्तृत रूप है-जो सारी विकृतियों और विसंगतियों को पैदा कर रही है।
ये विचार 9 सितम्बर, बुधवार को शास्त्री कॉलोनी स्थित नवकार भवन में विराजित जैनाचार्य पूज्य श्री विजयराजजी म.सा. ने प्रसारित मंगल सन्देश में कहे। आपने कहा-दो प्रकार का परिग्रह होता है-द्रव्य परिग्रह में जर, जमीन, सोना-चांदी, धन-धान्य, दास दासी एवं जरूरी साधनों के परिमाण का अतिक्रमण द्रव्य परिग्रह है, भाव परिग्रह आसक्ति मूलक काषायिक भाव, इन दोनों तरह के परिग्रह कर वर्जन करता हुआ साधक अमनोज्ञ, मनोज्ञ, शब्द, रूप, रस, गंध, स्पर्श की आसक्ति का भी त्याग करता है। इनके राग-द्वेष से दूर होता है आसक्ति का चक्रव्यूह तोड़े बिना आत्मानंद की अनुभूति नहीं होती। आसक्ति ही लोभ पैदा करती है। लोभ की पूर्ति न होने पर क्रोध पैदा होता है और पूर्ति होने पर अहंकार पैदा होता है।
आचार्य श्री ने कहा-संतोष का भाव आने पर ही व्यक्ति अपरिग्रह होने का सोचता है, उसे परिग्रह में सुख व शांति नहीं लगती, उसे लगता है अपरिग्रह का जीवन ही संतुष्टि देगा वह अनासक्ति के साथ अपरिग्रही बनकर संतोषी बन जाता है। परिग्रह या अपरिग्रह एक भावना है, सम्पत्तिशाली भी यदि अपने को सम्पत्ति का ट्रस्टी मानता है तो वह अपरिग्रही है और अकिंचन व्यक्ति लोभाविष्ट है तो वह परिग्रही है। परिग्रह का विवेक साधनों के तल पर ही नहीं विचारों के तल पर भी होना चाहिए। वैचारिक दृष्टि से अनासक्त व्यक्ति अपरिग्रही होता है। मालिक न बनकर अगर माली बनकर जीवन जीया जाए तो परिग्रह की आसक्ति कही चिपकती नहीं। जब भी व्यक्ति अपने को मालिक मानने की भूल करने लगता है वहां आसक्ति का दौर शुरू हो जाता है फिर यही कही जाकर नहीं रूकता, उसका अंत हीन सिलसिला चल पड़ता हैं यह आसक्ति कभी परिजनों पर तो कभी धन-माल पर कभी मान-सम्मान पर इस तरह आसक्ति रंग, रूप, अवस्था बदल-बदल कर आती रहती है और अपना प्रभाव दिखलाती है। त्याग, चेतना के जगने पर ही इससे पिंड छुड़ाया जा सकता है। कोविड महामारी के चलते हर मानव आसक्ति का त्यागी बनें, त्यागी नहीं बन सकते है तो रागी तो ना बने। राग रूलाता है-त्याग हंसाता है और प्रसन्नता देता है। त्याग में शांति बसी रहती है। राग अशांत करता है, राग के त्यागी बनो।

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