इन्सानियत बचाओ, ये बची तो सब कुछ बचेगा -जैनाचार्य श्री विजयराजजी म.सा.े

महावीर अग्रवाल
मन्दसौर २३ अक्टूबर ;अभी तक; इन्सान जितना ऑनलाइन होता जा रहा है, इन्सानियत ऑफ लाइन होती जा रही है, इन्सानियत के ऑफलाइन होते ही करूणा, दया, प्रेम, संवेदनशीलता सारे इन्सानियत के सद्गुण ऑफ लाइन होते जा रहे है, परिणाम स्वरूप व्यक्ति अशांत है, परिवार विभाजन हो रहे है, समाज विक्षुब्ध है, राष्ट्र आतंकित और विश्व विनाश के कगार पर है। इंसानियत का हृास सारी समस्याओं को पैदा कर रहा है, इसका विकास ही सही समाधान है। इंसानियत के अभाव में इंसान हैवान और शैतान बन जाता है। इंसानियत ही इंसान को इंसान होने का गौरव प्रदान करती है, डॉक्टर, वकील, अध्यापक और प्रोफेसर बनना आसान है, परन्तु अच्छा इंसान बनना बहुत ही कठिन है, अच्छा इंसान बनने के तीन नुस्खे है, खानपान की शुद्धता, आचरण की पवित्रता और विचारों में निर्मलता, इन तीन नुस्खों को अपनाकर कोई इंसान महान बन सकता है। जन्म से नहीं व्यक्ति कर्म से महान होता है। इंसान की इंसानियत बचेगी तो सम्प्रदाय बचेगा इंसानियत ही नहीं रही तो सम्प्रदाय कहाँ रहेगा, इंसानियत सम्प्रदाय और मजहब से भी ऊंचा तत्व है- इस सत्य को जानकर हमें इंसान के भीतर रहे इंसानियत के भावों को जगाना चाहिए ये जग गये तो इंसानियत बच जायेगी।
                            ये विचार शास्त्री कॉलोनी स्थित नवकार भवन में विराजित जैनाचार्य श्री विजयराजजी म.सा. ने प्रसारित धर्म संदेश में कहे। आपने कहा- इंसानियत की उपेक्षा कर कोई व्यक्ति केवल पूजा-पाठ या क्रियाकांडों के सहारे धार्मिकता का मुखौटा पहनने वाला कभी भी धर्म का स्वाद नहीं चख सकता, धर्म का पहला पायदान इंसानियत का भाव है। पूजा-पाठ या क्रियाकांडों से बहिर्जगत में व्यक्ति धार्मिकता की प्रतिष्ठा प्राप्त कर ले मगर आंतरिक जीवन में उसे प्रसन्नता की अनुभूति नहीं हो सकती, प्रसन्नता ही सच्ची पूंजी होती है जो इंसान को पूंजीपति बनाती हैं। इंसानियत के दो काम करके व्यक्ति जो प्रसन्नता की पूंजी कमाता है वो उसकी असली पूंजी कहलाती है बाकि कागज के नोट एक दिन में चलन बाद होते ही रद्दी हो जाते हैं विडम्बना इस बात की है-इंसान तिजोरियों में भरी जाने वाली पूंजी को ही पूंजी मानता रहा है इंसानियत को नहीं, जबकि इंसानियत से बड़ी पूंजी ओर कोई नहीं होती। इस पूंजी को कमाने वाला ही यशस्वी और वर्चस्वी होता है। सांसारिक व्यक्ति की चाह होती है उसकी तिजोरियाँ मालोमाल रहे, इंसानियत रहे या न रहे, यह निकृष्ट सोच होती है। उत्कृष्ट सोच व उच्च सोच के धनी व्यक्ति इंसानियत की पालना व सुरक्षा की ओर ध्यान देते है वे कभी इंसानियत को बेचकर अपना स्वास्थ नहीं साधते।
                       आचार्य श्री ने कहा-जो व्यक्ति तुच्छपन के लिये अपनी नैतिकता को खो देता है, वह अच्ख्छा इंसान कहलाने लायक नहीं रहता। इंसानियत का जन्म नहीं होता ये भाव जगाने होते हैं, हर इंसान के भीतर ये भाव होते हैं मगर स्वार्थ, लोभ, लालच और महत्वाकांक्षा के चलते इंसानियत के भाव दब जाते है, प्रेरणा और नैतिकता की शिक्षा से उनका जागरण होता है, इसमें सत्संग भी एक माध्यम बनता है जो धर्मप्रेमी और सत्संग प्रेमी होते है वे अपनी इंसानियत का रास्ता नहीं छोड़ते भले स्वयं कष्ट भोग लेंगे मगर इंसानियत छोड़कर किसी को कष्ट में नहीं डालते। कोविड महामारी के चलते हर इंसान को इंसानियत का महत्व समझना चाहिए और निडर होकर इंसानियत के पथ पर चलना चाहिए। इससे स्व-पर का भला होगा।

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