एकता से हर असंभव कार्य को संभव बनाया जा सकता है -जैनाचार्य श्री विजयराजजी म.सा.

महावीर अग्रवाल
मन्दसौर २८ अक्टूबर ;अभी तक; संगठन, एकता और परस्पर सहयोग में जो शक्ति है उसके द्वारा कोई भी काम असंभव नहीं रहता, हर कार्य एकता से ही संभव होता है। एकता का अर्थ यह नहीं कि हम पांचों अंगुलियों को एक कर हाथ की कार्य क्षमता को ही समाप्त कर दे। एकता का अर्थ है-पांचों अंगुलियाँ अलग-अलग रहती हुई भी परस्पर सापेक्ष रहे। सापेक्षता के अभाव में एकता का कोई महत्व नहीं। झुंड पशुओं का होता है मगर वे परस्पर सापेक्ष नहीं होते इसलिये उनकी एकता को मात्र झुंड कहते है, मानवों में जहां परस्पर सापेक्षता रहती है वही एकता सौहार्द भावों का निर्माण करती हैं। भिन्न-भिन्न अस्तित्वों का जब स्वीकरण होता है तब सौहार्द और समन्वय का विकास होता है, जो प्रगति को ठोस धरातल देती है।
                   ये विचार शास्त्री कॉलोनी स्थित नवकार भवन में विराजित जैनाचार्य श्री विजयराजजी म.सा. ने प्रसारित अपने संदेश में कहे। आपने कहा- पारिवारिक और सामाजिक जीवन में एकता का बड़ा महत्व है। एकता की चेतना में ही सुख, शांति, प्रेम, समता, विश्व बंधुत्व की भावना को बल मिलता है। सूरज की बिखरी किरणों में वो शक्ति नहीं है जो एकीकृत किरणों में होती है। एकीकृत किरणों से बड़े-बड़े कल कारखाने चलाये जा सकते है, जो शक्ति एकता में है वो छिन्नभिन्नता नहीं। जिन तिनकों को एकीकृत करके झाडू का आकार देकर कचरा निकाला जाता है वे तिनके बिखर कर स्वयं कचरा बन जाते है। वैसे ही एक मत और एक मन होकर हम हर असंभव कार्य को संभव कर सकते है। स्वार्थ, प्रलोभन, अहं और आग्रह के बिना सधने वाली एकता ही एकता है। जिस एकता में ये कारण उपस्थित हो जाते है वो छिन्नभिन्न हो जाती है। उस एकता का मात्र कलेवर रह जाता है, उसके प्राण निकल जाते है। एकता को प्र्राणवान बनाये रखने के लिये सह अस्तित्व, अविरोध, सद्भावना, सहिष्णुता और समन्वयशीलता की प्रमुख भूमिका रहती है। एकता से अपनत्व का भाव पनपना चाहिए जिस एकता मंे अपनत्व का भाव नहीं झलकता वह एकता दीर्घजीवी नहीं होती। अपनत्व का भाव ही एकता को शिखर तक पहुंचाता है। एकता मंजिल नहीं होती यह मार्ग होती है। वही मार्ग आसान और सुखद होता है जो श्रद्धा, निष्ठा व उत्सर्ग से निर्मित होता है।
                     आचार्य श्री ने कहा-आचार और विचारों की एकता के बिना किसी भी संगठन को स्थायी नहीं बनाया जा सकता। खासकर धार्मिक संगठन तो आचार और विचारों की एकरूपता पर अवस्थित होते है। जहां चरित्र में असमानता है वहां एकता कैसे हो सकती है। मंचीय एकता में केवल प्रदर्शन होता है, जब तक भीतर से मन न मिले तब तक एकता को स्थिरता व स्थायित्व नहीं दिया जा सकता। सुव्यवस्था का मूल एकता है, जिन आदर्शों के प्रति जन जन में आस्था का भाव पैदा नहीं होता वहां एकता का माहौल नहीं बनता, आस्था ही व्यवस्था को सुधारती है और व्यवस्था से अवस्था सुंदर बनती है। एकता परिवार को सुव्यवस्थित बनाती है तो समाज सुधार का आधार बनती है। इसके साथ ही परिवार और समाज की समुचित सुरक्षा एकता के भावों पर अवलम्बित है। जिस समाज में संगठन है वे प्रगतिशील होते है। उनकी प्रगति को कोई रोक नहीं सकता। एकता के सुपरिणामों से परिचित होकर ही हम एकता को दृढ़ता प्रदान कर सकते है। हर व्यक्ति को एकता के महत्व को समझकर अपने अहं-आग्रह और आवेश का त्याग करके एकता में सहयोगी व सहयात्री बनना चाहिए

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