कलह मुक्त घर-परिवार-समाज में शांति, शक्ति, सुरक्षा रहती है -जैनाचार्य श्री विजयराजजी म.सा.

महावीर अग्रवाल

मन्दसौर १७ सितम्बर ;अभी तक;  जहां मन है वहा मनन है, मनन के प्रतिकूल होने पर मतभेद पैदा होते है वे मतभेद आगे चलकर मन भेद का कारण बनते हैं, मन भेद फिर कलहकारी वातावरण निर्मित करता है, जो व्यक्ति इन्द्रिय, मन और वाणी पर नियंत्रण नहीं रखते वे कलह को जन्म देते हैं। परस्पर का कलह परिवार को छिन्न भिन्न करता है और समाज को विक्षुब्ध करता है। यह बात निश्चित है जिस घर व परिवार में कलह है वह कभी पनप नहीं सकता क्योंकि वहां लक्ष्मी का निवास नहीं होता, कलह दरिद्रता की निशानी है। कलह करने वाला व्यक्ति आध्यात्मिक दृष्टि से तो नुकसान करता ही है भौतिक दृष्टि से भी उसे काफी नुकसान उठाना पड़ता है। सुज्ञ व समझदार व्यक्ति की हर संभव कोशिश कलह से बचने की होती है वह यह जानता है कलह में शांति, संतुष्टि और समाधि नहीं रहती। कलह ही सार्वजनिक और वैयक्तिक अशांति का मूलभूत कारण है। वह शांति, शक्ति और सुरक्षा का शति होता है।

ये विचार शास्त्री कॉलोनी स्थित नवकार भवन से विराजित जैनाचार्य श्री विजयराजजी म.सा. ने 17 सितम्बर, गुरूवार को प्रसारित अपने संदेश में कहे। आपने कहा- मतभेदों को दूर करने के लिये व्यक्ति को अपने विचारों का आग्रहशील नहीं होना चाहिए, अच्छी व सच्ची बात भी मानने के आग्रह के साथ कही जाती है तो मतभेद पैदा करती है, कहना हर व्यक्ति का अधिकार है, मानना न मानना यह सामने वालों का अधिकार क्षेत्र में आता है, उन्हें आपके विचारों की जरूरत होगी तो मान लेंगे, नहीं होगी तो नहीं मानेंगे, यह उन्हीं के ऊपर छोड़ना चाहिए, आग्रह शीलता आवेश पैदा करती है और जहां आवेश है वहां असहिष्णुता है, असहिष्णुता कलहकारी वातावरण निर्मित करती है। आवेश में व्यक्ति दूसरों के दृष्टिकोण को समझ नहीं पाता, उसे लगता है ये मेरी बात सुनना नहीं चाहते या मेरी बात पर चलना नहीं चाहते, ऐसे में संघर्ष और विग्रह की शुरूआत हो जाती है आगे चलकर भयंकर मतभेद हो जाते है। इन मतभेदों को समाप्त करने के लिये पहली आवश्यकता दृष्टिकोण को समझने की और दूसरी अपेक्षा अनावश्यक हस्तक्षेप न करने की होती है। जहां असहिष्णुता निरपेक्षता और अनावश्यक हस्तक्षेप होते है वहां कलह को पैदा होने से रोका नहीं जा सकता।

आचार्य श्री ने कहा-जिस परिवार, समाज और राष्ट्र में कलह है वो कभी प्रगति नहीं कर सकता। प्रगतिशील वे ही होते है जो कलह शांति के उपायों को आजमाते है। विचारभेद बुरे नहीं होते ये तो, प्रगतिशील व समझदार मानवों के लक्षण है। मगर वे विचार भेद संघर्षाें में नहीं बदलने चाहिए जो विचार भेद संघर्षों और व्यक्तिगत छीटांकशी में बदल जाते हैं वे प्रगति के रास्ते के रोड़े बन जाते है। व्यक्तिगत स्वार्थ, पद का लोभ, पैसे का लालच और महत्वकांक्षाएं अनेक तरह के कलह पैदा करती है। जो समाज सेवा में जुटे रहते है वो इन सबका बलिदान करते है। छोटे-छोटे स्वार्थों में टकराते नहीं, उनकी सोच सकारात्मक होती है, दृष्टि दूरदर्शी और नेक इरादे लेकर वे चलते है। ऐसे समाजसेवक स्वार्थों के त्यागी होते है और स्वार्थ त्याग की तपस्या सबसे कठिन होती है। मनस्वी समाज सेवक इस तपस्या को बिना खेद रखकर करते है उन्हें अपने समाज व परिवार से लगाव होता है। उसमें कभी कलह उत्पन्न ही नहीं होने देते। ऐसे समाजसेवियों को लोग सिर आंखो ंपर बिठाकर रखते है। ऐसे लोग ही समाज के सम्प व संगठन के हिमायती होते है। आने वाला कल उन्हीं के नाम पर स्वर्णाक्षरों से लिखा जाता है। कोरोना महामारी के चलते हर मानव को कलह मुक्त घर-परिवार समाज के निर्माण का संकल्प लेना चाहिए।

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