कागजों के मायाजाल में उलझते युवा एवं विद्यार्थी – रमेशचन्द्र चन्द्रे 

10:29 pm or July 26, 2022
महावीर अग्रवाल
मंदसौर २६ जुलाई ;अभी तक; बच्चे के जन्म से लेकर ही कागजों का खेल शुरू हो जाता है नगर पालिका से जन्म प्रमाण पत्र जब बनता है उस समय उसका नाम जो लिखा जाता है उस नाम से स्कूल में बच्चे का प्रवेश नहीं होता विसंगति यहीं से शुरू होती है क्योंकि बार-बार नियमों में परिवर्तन अर्थात पिता द्वारा प्रमाणित नाम एवं जन्म तारीख तथा जाति को वैधानिक बताने के कारण छात्र के स्कूली प्रवेश के समय जो जाति, जन्म दिनांक एवं नाम लिखे जाते हैं वह सब अलग होते हैं और जब जन्म प्रमाण पत्र  प्रस्तुत किए जाते हैं फिर विसंगति शुरू हो जाती है। कई बार अभिभावक अपनी जाति छुपाते हैं और लाभ का गणित देखते ही अपनी असली जाति बताते हैं फिर दौर चलता है प्रमाण पत्रों का। अस्थाई एवं स्थाई जाति प्रमाण पत्र के लिए राजस्व विभाग के चक्कर काटे जाते हैं सरपंच, वार्ड पार्षद, पटवारी एवं संबंधित स्कूल के जाति प्रमाण पत्रों के आधार पर राजस्व डिपार्टमेंट अनेक कठिनाइयों के पहाड़ खड़े करके जाति प्रमाण पत्र जारी करता है।
फिर छात्र की एसएसएमआईडी, आधार कार्ड इत्यादि के साथ हिंदी नाम और अंग्रेजी नाम में स्पेलिंग की त्रुटियों के कारण स्कूल एडमिशन के समय प्रस्तुत प्रमाण पत्रों में नाम के अंतर होने के कारण छात्र फिर परेशानी के गर्त में चले जाते हैं। अनुसूचित जाति, जनजाति एवं पिछड़ी जाति तथा अल्पसंख्यकों के लिए सरकार द्वारा छात्रवृत्ति के प्रावधान किए गए हैं जिन्हें प्राप्त करने के लिए शासकीय कार्रवाई एवं वकील इत्यादि का खर्च कुल मिलाकर छात्रवृत्ति की प्राप्त राशि की तुलना में 70 प्रतिशत कागज बनाने की कार्यवाही पर ही खर्च हो जाता है।
प्रदेश के सरकारी स्कूलों में विद्यार्थियों के नाम के आगे सरनेम नहीं लगाए जाते और आठवीं कक्षा की जो टीसी प्राप्त होती है उसे संलग्न कर अभिभावक कक्षा 9वी में आवेदन पत्र पर अपने सरनेम भी लिखता है और यहां से भी संकट शुरू हो जाते हैं। इसी बीच कक्षा नौवीं दसवीं और बारहवीं की अंकसूची में जन्म तारीख, नाम की स्पेलिंग इत्यादि की त्रुटि, चाहे छात्र या स्कूल अथवा माध्यमिक शिक्षा मंडल की हो उसे ठीक कराने के लिए सारे कागजों के सर्टिफिकेट छात्रों को ही तैयार करने की मशक्कत करनी पड़ती है इसके लिए स्कूल एवं संकुल प्रभारी तथा जिला शिक्षा अधिकारी के प्रमाण पत्र प्राप्त करने हेतु अच्छी खासी कसरत हो जाती है और यदि  विद्यार्थी विदेश जाने हेतु पासपोर्ट बनाना चाहता है तो समझो शासकीय विभाग जिसमें स्थानीय पुलिस तथा राजस्व विभाग सहित भोपाल के कार्यालय उसकी नाक में दम कर देते हैं।
हद तो तब होती है जब नर्सरी कक्षा से कक्षा बारहवीं तक मध्यप्रदेश में अध्ययन करने वाले छात्र छात्राओं को भी महाविद्यालय में प्रवेश के लिए मध्यप्रदेश में मूल निवास का प्रमाण पत्र बनाने के लिए बाध्य किया जाता है। ऐसा प्रतीत होता है कि जैसे नर्सरी से लेकर 12वीं तक के समस्त सर्टिफिकेट, महाविद्यालय और विश्वविद्यालय के लिए फर्जी माने जाते हो और फिर मध्यप्रदेश में मूल निवासी प्रमाण पत्र के लिए वकीलों के चक्कर लगाकर कागज तैयार करने पड़ते हैं उसके लिए भी विद्यार्थियों को शपथ पत्र इत्यादि देने पड़ते हैं। इस प्रकार पढ़ाई के प्रारंभ से लेकर नौकरियां ढूंढने तक छात्र-छात्राएं एवं युवा वर्ग सिर्फ कागजों के जंगल में उलझते रहते हैं जिसका कई माईनों में कोई औचित्य नजर नहीं आता है।
उक्त स्थिति देखकर ऐसा प्रतीत होता है कि शासन में बैठे हुए आईएएस, आईपीएस अधिकारी एवं अन्य अधिकारी तथा कर्मचारी अपने दिमाग का उपयोग करना नहीं चाहते  और ना ही इस प्रकार की स्थिति से निपटने के लिए कोई योजना बनाना चाहते है। आजादी के पहले अंग्रेजों ने पहचान के नाम पर जनता को परेशान किया और आजादी के बाद अपने ही लोग अंग्रेजों से ज्यादा पहचान एवं प्रमाण पत्रों के नाम पर परेशान कर रहे हैं और जनता तथा जनप्रतिनिधि मुंह बंद करके बैठे हुए हैं। कानून बनाने वाले विधायक और सांसद भी जमीन से जुड़ी इन समस्याओं का विचार नहीं कर पा रहे हैं। कागजों का मायाजाल जी का जंजाल बना हुआ है और युवा वर्ग इन कागजों के जंगल में भटक रहा है, इसलिए इस दिशा में उचित प्रयास की दरकार है।