कानून की विसंगतियों का दर्द झेल रहे कई रिटायर्ड पुलिस अधिकारी/कर्मचारी-चन्द्रे

2:49 pm or August 2, 2022
महावीर अग्रवाल
मन्दसौर २ अगस्त ;अभी तक;  अपराध का क्षेत्र और सीमाएं असीम होती है और अपराध को पूरी तरह समाप्त नहीं किया जा सकता । ऐसा कहा जाता है कि ‘‘अपराध को नियंत्रित तो किया जा सकता है किंतु समूल नष्ट नहीं किया जा सकता’’। अपराध करने वालों की संख्या कभी भी समाप्त नहीं होती किंतु पुलिस विभाग जो अपराधियों को नियंत्रित करने के लिए काम करता है उसके साथ एक बहुत बड़ी विडंबना है, क्योंकि पुलिस कर्मचारी और अधिकारी सेवा में रहते हुए जिन प्रकरणों की कायमी करते हैं वह लंबे समय तक न्यायालय में विचाराधीन रहती हैं किंतु इसी बीच पुलिस अधिकारियों के और कर्मचारियों के तबादले विभिन्न स्थानों पर हो जाते हैं।
                     उक्त बात कहते हुए शिक्षाविद् रमेशचन्द्र चन्द्रे ने कहा कि भारत में न्याय प्रक्रिया लंबी चलती है और ऐसी परिस्थिति में किसी भी प्रकरण से जुड़े हुए पुलिस अधिकारी और कर्मचारियों को लंबे समय तक इंदौर, जबलपुर, एवं ग्वालियर इत्यादि स्थानों पर पेशी अटेंड करने के लिए जाना पड़ता है जबकि रिटायरमेंट के कई वर्षों बाद भी ये पेशियां चलने के कारण यह लोग शारीरिक परेशानियों से ग्रसित होने के बाद भी ट्रेन और बसों में यात्रा करके संबंधित स्थानों पर पहुंचते हैं जो अत्यंत ही अमानवीय प्रतीत होता है जबकि इन्हें न्यायालय द्वारा अथवा विभाग के द्वारा किसी प्रकार का यात्रा भत्ता या आवासीय भत्ता प्रदान नहीं किया जाता।
श्री चन्द्रे ने प्रदेश के मुख्यमंत्री एवं गृहमंत्री से आग्रह है कि पुलिस विभाग के निवृत्त तमाम अधिकारी एवं कर्मचारियों को केवल रिटायरमेंट की तारीख से 5 वर्ष तक ही न्यायालय की पेशियों में उपस्थित होने का प्रावधान होना चाहिए और उसके बाद स्वतः ही अर्थात 65 साल की उम्र के पश्चात किसी भी पुलिस कर्मचारियों की न्यायालय में उपस्थिति को अवैध घोषित कर देना चाहिए ताकि रिटायर्ड कर्मचारी अपना जीवन शांति से बिता सकें, क्योंकि पुलिस कर्मचारी का भी अपना व्यक्तिगत और पारिवारिक जीवन होता है।