कान्वेन्ट याने ‘‘लावारिस बच्चों का स्कूल’’ जिससे बच्चों को दूर रखना जरूरी

5:26 pm or November 25, 2021
महावीर अग्रवाल
मन्दसौर २५ नवंबर ;अभी तक;  अपने बच्चों को ऐसे विद्यालयों में विद्याध्ययन के लिए क्यों प्रवेश दिलवाया जावे, जहां पर अपने वैदिक व आध्यात्मिक संस्कारों का पालन करने से रोका जाता है। बच्चों को तिलक लगाने से, बालिकाओं का बिन्दी लगाने से, व्रत एवं संस्कृति के उत्सवों को मनाने से रोका जाता है। समस्त हिन्दू समाज को ऐसे कान्वेंट स्कूलों का बहिष्कार करना चाहिए।
                        सामाजिक कार्यकर्ता रविन्द्र पाण्डेय ने कहा कि कान्वेन्ट संस्कृति और कान्वेन्ट नाम विद्यालय का कैसे पड़ा ? कान्वेंट की परिभाषा दार्शनिक रूसों के अनुसार बच्चे पति-पत्नी के शारीरिक आनन्द में बाधक है इसलिये उनको रखना अच्छा नहीं है, इसलिये शारीरिक आनन्द ही सबकुछ होता है और शारीरिक संबंधों से उत्पन्न अवैध संतानों को रखने का स्थान कान्वेंट स्कूल होता है। एक दार्शनिक प्लेटों के अनुसार हर मनुष्य का आखरी उद्देश्य है शारीरिक आनन्द की प्राप्ति। अगर बच्चे उसमें रूकावट है तो उनको रखना नहीं छोड़ देना। ऐसे ही दूसरे दार्शनिक जैसे टिकारते लेबेनित्ज, अरस्तु सबने अपने बच्चों को लावारिस छोड़ा था। ऐसे छोड़े हुए बच्चों को रखने के लिये यूरोप के राजाओं ने या सरकारों ने कुछ संस्थाएं खड़ी की जिनको कान्वेन्ट कहा जाता है । कान्वेन्ट का वास्तविक अर्थ है ‘‘लावारिस बच्चों का स्कूल।’’कान्वेन्ट में पढ़ने वाले बच्चों को मॉ-बाप का अहसास कराने के लिये पढ़ाने वाले को मदर, फादर, ब्रदर और सिस्टर कहते है। कान्वेन्ट स्कूल की उत्पत्ति का यह सच जिसे पढ़कर आप हिल जायेंगे। गुलाम भारत में 1842 में पहला कान्वेन्ट स्कूल कलकत्ता में प्रारंभ किया गया था। वर्तमान परिप्रेक्ष्य में आये दिन देश के अन्दर ऐसी कई घटनाएं हो रही है जहां पर हिन्दू विद्यार्थी जो कान्वेन्ट स्कूल में पढ़ते है उनको अपने वैदिक व आध्यात्मिक संस्कारों को अपनाने से रोका जा रहा है। धीरे-धीरे उनका धर्मान्तरण कर दिया जाता है।
                        श्री पाण्डेय ने कहा कि हिन्दू समाज के कई तथाकथित उच्च वर्ग के धनाढ्य माता-पिता अपनी सन्तान को इन कान्वेन्ट स्कूलों में प्रवेश दिलवाते है जहां उन बच्चों को अपने संस्कारों से दूर कर दिया जाता है। और शिक्षा पूर्ण करते-करते वे पूर्ण रूप से भावनात्मक संबधों से दूर हो जाते है और वे अपने माता-पिता का सम्मान करना छोड़ देते है। क्योंकि उनमें भावनात्मक जो हिन्दू समाज के संस्कार है मर्यादा पुरूषोत्तम भगवान श्री राम का जीवन जिसमें कहा है कि प्रातःकाल उठीके रघुनाथा, मातपिता गुरू नावेय माथा। तो पहला गुरू मात-पिता के बाद में शिक्षा देने वाला गुरू जिसके  प्रति पूर्ण रूप से श्रद्धा आज इन चीजों का अभाव पश्चिम के अंधानुकरण के कारण हमारी भावी पीढ़ी पर पड़ रहा है। कान्वेन्ट संस्कृति से हमें अपनी संतानों को बचाना चाहिए। वर्तमान समय में पाकिस्तान, अफगानिस्तान, बांग्लादेश में जो दशा हिन्दूओं की हो रही है उसके पीछे हमने अपनी संस्कृति और संस्कारों की चिंता नहीं की। जिसको हमने नहंी बचाया उसकी का दुष्परिणाम हमारे सामने है। भारत का भी बहुत बड़ा क्षेत्र इन कान्वेन्टों ने बड़े पैमाने पर हिन्दूओं का धर्मांतरण कर दिया हैं। हमें इसाई मशीनरी और कान्वेन्ट संस्कृति से भावी पीढ़ी को बचाना होगा। उसी से हमारी हिन्दू संस्कृति बचेगी। आद्य गुरू शंकराचार्यजी महाराज का प्रादूर्भाव अपनी वैदिक सनातन संस्कृति को बचाने के लिये हुआ था जिन्होंने सनातन वैदिक संस्कृति का पुर्नस्थापन किया। हमें आचार्य शंकर के बताये मार्ग पर चलकर भावी पीढ़ी के लिये शिक्षा के केन्द्रों का चयन करना चाहिए।