क्रोध में किसी को श्राप और हर्ष में किसी को वचन नहीं देना चाहिए – चैतन्यानन्दगिरीजी मसा

6:41 pm or July 25, 2022

महावीर अग्रवाल

मंदसौर २५ जुलाई ;अभी तक;  चातुर्मास के पावन माह सावन में नगर के खानपुरा स्थित केशव सत्संग भवन में बनारस से शिक्षा प्राप्त स्वामी श्री चैतन्यानन्दगिरीजी मसा के मुखारबिंद से श्रीमद् देवी भवगती महापुराण का वाचन किया जा रहा है। प्रतिदिन प्रातः 8 बजे से 10 बजे तक प्रवचनों में बडी संख्या में धर्मालुजन सम्मिलित हो रहे है।

                      25 जुलाई सोमवार को धर्मसभा में चैतन्यानन्दगिरीजी महाराज साहब ने उपस्थित श्रोताओ को कौरव और पाण्डवों की उत्पति के बारे में बताया। आपने धर्मसभा में बताया कि श्रीकृष्ण के वंश यदुवंश को एक ऋषि ने श्राप दिया था कि सभी यदुवंशी आपस में लडकर खत्म हो जायेगा और यदुवंश का नाश हो जायेगा। ऋषि के श्राप अनुसार पूरा यदुवंश खत्म हो गया। उसके बाद श्रीकृष्ण ने भी अपना देह त्याग दिया। स्वामी जी ने बताया कि पाण्डवों और कौरवों के युद्ध के बाद पाण्डवों को भ्रार्त हत्या का दोष लगा एवं कौरवों के पिता धर्तराष्ट्र भी महाभारत के युद्ध के लिए जिम्मेदार थे इसलिए उन्होने यज्ञ आदि करवाकर दोष का निवारण किया। महाभारत युद्ध के 36 हजार वर्ष बाद पाण्डवों ने भी देह त्याग दिया और हस्तीनापुर पाण्डवों के पौत्र और अभिमन्यु के पुत्र परिक्षित को सौंप दिया।
स्वामी जी ने बताया कि परिक्षित ने भी एक ऋषि के साथ गलत व्यवहार किया क्रोध मंे आकर ऋषि के पुत्र ने परिक्षित को श्राप दिया की सात दिनों के भीतर तक्षक नाग के काट जाने से राजा परिक्षित की मृत्यु हो जायेगी। जब ऋ़षि को ज्ञात हुआ कि यह तो पाण्डवों के पौत्र है हमशे क्रोध में गलती हो गई लेकिन अब कुछ नहीं हो सकता।
यह वृतांत सुनाकर स्वामी जी ने कहा कि हमे क्रोध में आकर किसी को श्राप या अपशब्द नहीं कहना चाहिए और ना ही हर्ष और प्रसन्नता के समय किसी को कोई वचन देना चाहिए दोनों ही परिस्थितियों में हमें अपने आप पर काबू रखना चाहिए।
स्वामी जी ने बताया कि राजा परिक्षित को जब मृत्यु का अहसास हुआ तो उसने बचने के कई जतन किये लेकिन तक्षक नाग ने उन्हें आकर डंस ही लिया। स्वामी जी ने बताया कि मृत्यु अटल है इसे कोई नहीं टाल सकता है। जब अंत समय निकट हो तो धर्म, भजन, पूजन, दान पुण्य आदि करना चाहिए।

हमेशा पुरूषार्थ करते रहना चाहिए
धर्मसभा में स्वामी जी ने बताया कि पुरूष को कभी निष्काम, निठ्ठला नहीं रहना चाहिए। उसे सदैव अपने पुरषार्थ का उपयोग करते रहना चाहिए। पुरूष को पुरूषार्थ के बल पर ही परिवार और समाज में सम्मान मिलता है। धर्मसभा के अंत में भगवान जगदीश की आरती उतारी गई, जिसके बाद प्रसाद वितरण किया गया।
धर्मसभा में जगदीशचंद्र सेठिया, रविन्द्र पाण्डे, पं शिवनारायण शर्मा, मोहनलाल गुप्ता, रामनिवास सेठिया, राधेश्याम दानगढ, भेरूलाल भालोट, गिरधारीलाल शर्मा आदि उपस्थित थे।