गुरु गोविंद सिंह की पुण्यतिथि पर विशेष- सिखों को सरदार क्यों कहते हैं? 

महावीर अग्रवाल
मन्दसौर ७ नवंबर ;अभी तक;  उस समय हिंदू धर्म पर संकट छाया हुआ था और मुगल शासक हिंदू धर्म को समूल नष्ट करने में लगे थे। तलवार के बल पर शिखा और जनेऊ उतारे जा रहे थे, मंदिर, मठ और शिवालय तोड़े जा रहे थे, गोवंश का वध करने के साथ-साथ हिंदू बहू-बेटियों की लाज लूटी जा रही थी और ऐसी परिस्थिति में अनेक हिंदू राजा स्वार्थ, विलास और पारस्परिक द्वेष से स्वयं जर्जर हो रहे थे।
                  उक्त स्थिति में हिंदू धर्म की रक्षा के लिए गुरु तेग बहादुर के बलिदान के बाद उनके पुत्र गोविंद राय को गुरु का पद प्रदान किया गया। गुरु गोविंद राय ने अपने पिछले वंशजों की परंपरा से अलग अपना नाम गुरु गोविंद सिंह रखा और सभासदों के बीच यह घोषणा की कि हिंदुओं के शांतिपूर्ण बलिदान से मुगल शासन नहीं सुधरने वाला नहीं है  इसलिए तलवार का जवाब तलवार से देकर ‘शठे शाठ्यं समाचरेत्‘ की नीति पर चलकर हिंदू धर्म की रक्षा करना होगी और इसी श्रृंखला में आगे चलकर उन्होंने खालसा पंथ की स्थापना की। खालसा पंथ जिसे उर्दू में खालिश हिंदी में शुद्ध तथा अंग्रेजी में प्योर कहा जाता है। इस हेतु उन्होंने अपने जन समुदाय की सभा में आह्वान किया कि हिंदू धर्म की रक्षा के लिए सर्वप्रथम कौन अपना बलिदान दे सकता है इस घोषणा के बाद अनेकों हाथ उठे। उन्होंने हाथ में तलवार लेकर कहा कि आज देवी दुर्गा बलिदान मांग रही है ऐसा कोई वीर है जो देवी की प्रसन्नता के लिए अपना सिर दे सके ? यह सुनकर सभा में कुछ देर सन्नाटा छाया रहा किंतु तभी एक 30 वर्षीय तरुण उठा और बोला कि मैं अपना सिर भेंट करने को तैयार हूंॅ। यह लाहौर के निवासी भाई दयाराम खत्री थे। गुरु गोविंद सिंह उन्हें एक बंद तंबू में ले गए और खून से रंगी हुई तलवार लेकर वापस आए और कहां की देवी और बलिदान चाहती है उसके बाद दिल्ली निवासी धर्मदास जाट, उसके बाद मोहकमचंद धोबी, बीदर निवासी साहब चंद नाई, हिम्मत राय कुम्हार इन पांचों के बलिदानों के संकल्प बाद बलिदान की भावना से उपस्थित जनसमूह उमड़ पड़ा और हमारा सिर लीजिए, हमारा सिर लीजिए, कहकर अनुरोध करने लगा।
                     तभी लोगों ने देखा कि वे पांचों वीर बलिदानी सुंदर वेशभूषा में तलवार लिए गुरु के साथ सभा मंच पर आ गए लोगों के आश्चर्य का ठिकाना न रहा। वास्तविक बात यह थी कि गुरु जी ने उन बलिदानियों के स्थान पर केवल रक्त से सनी हुई तलवार दिखाई थी ताकि लोगों के धैर्य तथा दृढता की परीक्षा ली जा सके उनका यह प्रयोग सफल हुआ और जनगण में बलिदान की भावना अटल और अविरल हो गई। उसी समय गुरु गोविंद सिंह ने उन पांचों को पंज प्यारे की उपाधि देकर सिंह पद से उनके नाम विभूषित कर जन समुदाय को निर्देश दिया कि आज से आप लोग वीर भावना के लिए अपने नाम के साथ सिंह लाएंगे और अपने उद्देश्य के अनुरूप कृपाण, कड़ा ,केश, कंघा और कच्छ यह 5 चीज सदैव अपने पास रखेंगे और जो सिख इसको धारण करेंगे वे खालसा कहलाएंगे। इस परंपरा को आगे बढ़ाते हुए संपूर्ण पंजाब तथा पंजाब से जुड़े क्षेत्रों में गुरु गोविंद सिंह के शिष्य बनने की होड़ लग गई और गुरुजी ने आव्हान किया कि देश और धर्म की रक्षा के लिए प्रत्येक परिवार से एक व्यक्ति खालसा पंथ में सम्मिलित हो और एक विशेष वेशभूषा के साथ अपने आप को समर्पित करें। गुरु गोविंद सिंह द्वारा खालसा पंथ की शक्ति बढ़ती गई और बहुत बड़ी फौज खड़ी हो गई। हिंदू धर्म की रक्षा के लिए खालसा पंथ के सिखों को हिंदू समाज ने सरदार शब्द से सम्मानित किया और कहा कि यह हिंदू धर्म की रक्षा के लिए समर्पित है इसलिए यह हमारे सरदार हैं तब से सिखों को सरदार जी शब्द से संबोधित किया जाता है।
इस प्रकार एक विशाल सुदृढ, सुदीक्षित, सशस्त्र संगठन बनाकर गुरु गोविंद सिंह ने अनीति और अत्याचार के विरुद्ध युद्ध और संघर्ष करना प्रारंभ कर दिया इनके इस पवित्र अभियान में सहायता करने के लिए आसपास के अनेक राजा आगे आने लगे उन्होंने इनकी सहायता से लोहागढ़, फतेहगढ़, फुल गढ़ और आनंदगढ़ नाम के चार किले  बनवाए और उनमें बड़े युद्ध की तैयारी करने लगे।
                     गुरु गोविंद सिंह के अभ्युदय का समाचार मुगल बादशाह को मिला तो उसने मियां खां ,अलफ खां और जुल्फिकार खा नामक तीन मुगल सरदारों को एक बड़ी सेना देकर उनके विरुद्ध युद्ध करने के लिए भेजा उन्होंने आते ही चवां, नहान, नालागढ़ क्षेत्र में हत्याओं और लूटमार का सिलसिला प्रारंभ किया किंतु गुरु गोविंद सिंह की छोटी सी सेना ने उनका मुकाबला कर मुगल सेना के हौसले पस्त कर दिए और मुगल सेना भाग गई।
गुरु गोविंद सिंह की इस विजय की सूचना मुगल शासकों में चिंता का कारण बन गई और एक के बाद एक मुगल शासक अपनी सेना लेकर गुरु गोविंद सिंह से युद्ध करने के लिए आने लगी। हिंदू धर्म की रक्षा की भावना से बलवान गुरु गोविंद सिंह जी की विजय पर विजय का समाचार सुनकर दिल्ली का सिंहासन हिल उठा। बादशाह ने अपने शहजादे को एक बड़ी सेना लेकर आक्रमण करने के लिए भेजा किंतु सिखों की मुट्ठीभर सेना ने उन्हें खदेड़ दिया। खालसा पंथ की शक्ति और संगठन के प्रचार ने मुगल बादशाह औरंगजेब की नींद उड़ा दी उसे अपना साम्राज्य तथा सिंहासन जाता हुआ दिखाई देने लगा। इससे उत्तेजित होकर मुगल सेना ने अपने आक्रमण तेज कर दिए और एक के बाद एक युद्ध गोविंद सिंह जी को लड़ना पड़ा। इस युद्ध में उनकी माता, पत्नी और चार बेटे युद्ध की भेंट चढ़ गए और दो नन्हे बच्चों को जिंदा ही मुगलों ने दीवार में चुनवा दिया किंतु गुरु गोविंद सिंह का आत्मबल कमजोर नहीं हुआ उन्होंने बंदा बैरागी की सहायता लेकर अनेक युद्ध लड़े और जीते।
                    गुरु गोविंद सिंह उन दिनों गोदावरी के तट पर ‘नगीना’ नाम का एक घाट बनवा रहे थे उनके संगठन में अनेक मुसलमान भी शिष्य थे किंतु उनमें एक गद्दार छुपा हुआ था जिसका नाम अत्ताउल्लाह खा था। उसका पिता पैदे खा एक युद्ध में गुरु जी के हाथों मारा गया था उसके अनाथ पुत्र को गुरुजी ने अपने आश्रय मे रखकर पाला लिया था किंतु उनकी यही दया उनके लिए भारी पड़ गई और उसी अत्ताउल्लाह खा है सोते हुए गुरुजी पर कटार से वार किया जबकि गुरुजी तत्काल सतर्क हुए और भागते हुए अताउल्ला को कटार फेंक कर मारी जिसके कारण वह वही मर गया किंतु गुरु जी घायल हो गए उनके जख्म को सील दिया गया तभी औरंगजेब मर गया और बहादुर शाह ने धार्मिक अत्याचार बंद कर गुरुजी से संधि कर ली तथा उसने गुरु जी की सेवा में बहुत से अस्त्र-शस्त्र एवं धन भेजा। उसी के साथ एक ऐसा धनुष भेजा जो सामान्यतः लोगों से उठता भी नहीं था पर गुरु गोविंद सिंह जी ने उसको बलपूर्वक चढ़ा दिया इसी क्रिया में उनके जख्मो के टांके टूट गए और रक्त की धारा बह निकली। बहुत प्रयास के बाद भी रक्त नहीं रुका और कार्तिक माह संवत 1765 को गुरु जी ब्रह्मलीन हो गए यह सिख समाज के दसवें गुरु थे बाद में उन्हीं की आज्ञा से गुरु ग्रंथ साहिब को गुरु माना जाता है।
(रमेशचन्द्र चन्द्रे)