गोवा सिर्फ रोमांटिक  नहीं बल्कि शहीदों के खून से पवित्र स्थान है -रमेशचन्द्र चन्द्रे 

8:20 pm or August 2, 2022
महावीर अग्रवाल
       मन्दसौर २ अगस्त ;अभी तक;   आज की युवा पीढ़ी के लिए गोवा घूमने की कल्पना मात्र ही आत्म विभोर करने वाली होती है गोवा के नाम से सभी उम्र के लोगों की रोमांटिक भाव भंगिमाएं प्रकट होने लगती है ,किंतु आज भी अनेक भारतीयों को इस बात की जानकारी नहीं है कि भारत की स्वतंत्रता के बाद भी गोवा को 1961 तक पुर्तगालियों से मुक्त कराने हेतु भारत सरकार सहित अनेक राष्ट्रवादी संगठनों को आंदोलनकारी अभियान चलाने पड़े थे ।
                      गोवा मुक्ति आंदोलन में मालवा तथा मंदसौर- नीमच जिले  विशेष योगदान रहा है क्योंकि उज्जैन के राजा भाऊ महाकाल गोवा मुक्ति आंदोलन में शहीद हो गए थे तथा मंदसौर के पूर्व विधायक श्री गजा महाराज के पंजे की पांचों उंगलियां कट गई थी इसके साथ ही मंदसौर के ही स्वर्गीय रामचंद्र जी भाया एवं श्री मिश्रीलाल फांफरिया तथा नीमच से पूर्व विधायक खुमान सिंह शिवाजी एवं गरोठ के मोहनलाल जी सेठिया ने भी इस आंदोलन में भागीदारी की थी
                     भारत में अंग्रेजों के आने से पहले सन  1510 में पुर्तगाली भारत आए तथा 1961 में यहां उपनिवेश छोड़ने वाले वे आखरी यूरोपीय शासक थे ! गोवा में पुर्तगालियों की एक अलग शासन व्यवस्था थी पुर्तगाल ने गोवा को “वॉइस ऑफ़ किंगडम” का दर्जा दिया था इसके कारण यहां के नागरिकों ठीक वैसे ही अधिकार प्राप्त थे जो पुर्तगाल में वहां के निवासियों को मिल रहे थे इसके साथ ही उच्च वर्ग के हिंदू, ईसाइयों एवं धनाढ्य वर्ग के लोगों को यह विशेषाधिकार था कि वह पुर्तगाली संसद में गोवा का प्रतिनिधित्व करने के लिए अपना वोट डाल सकते थे
               17 मई 1498 को पुर्तगाल से वास्कोडिगामा समुद्री रास्ते के द्वारा भारत के तट पर आया जिसके कारण पुर्तगाल से भारत आने का रास्ता खुल गया वास्कोडिगामा की सहायता गुजरात के एक व्यापारी अब्दुल माणिक की थी और उसने ही कालीकट के राजा से उसे व्यापार करने की अनुमति दिलवाई थी इसके बाद निरंतर अनेक पुर्तगाली व्यापारी भारत की ओर आते रहे तथा धीरे-धीरे उन्होंने गोवा, पांडुचेरी, दादर नगर हवेली, दमन- दीव आदि क्षेत्रों पर अपना अधिकार जमा लिया बाद में धीरे धीरे पुर्तगाल से समुद्रिक डाकुओं का प्रवेश भी हुआ तथा पुर्तगाली शासन भी पूरी तरह उनका मददगार बन गया था इनके द्वारा भारतीय व्यापारियों के मालवाहक जहाजों को लूटा जाता था जिसके कारण भारत के मुगल शासक तथा मराठों के द्वारा इन पर जबरदस्त आक्रमण भी किए गए
                       सन 1857 और उसके बाद स्वतंत्रता संग्राम में पुर्तगालियों के अधिकार क्षेत्र से भारत को स्वतंत्र कराने की कल्पना भी उस समय के संगठनों में नहीं  थी यहां तक की भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के स्वतंत्रता संग्राम एजेंडे में गोवा सम्मिलित नहीं था और अनेक भारतीय तो इसे भारत का हिस्सा ही नहीं मानते थे
                     किंतु 1946 में  राम मनोहर लोहिया द्वारा गोवा की स्वतंत्रता का मुद्दा उठाया गया और उनके नेतृत्व  में ही गोवा मुक्ति हेतु आंदोलन चलाया गया किंतु 1946 से 1954 तक देश में गृह युद्ध जैसी स्थिति उत्पन्न होने के कारण यह आंदोलन ज्यादा नहीं चल पाया  किंतु फिर 1954 में गोवा विमोचन समिति के माध्यम से  आंदोलन छेड़ा गया जिसमें अनेक राष्ट्रवादी संगठनों ने भी सहयोग दिया जिसका नेतृत्व मधु लिमए के द्वारा किया गया था और इस कारण से वे 1955 से लेकर 1957 तक 19 माह पुर्तगालियों की की जेल में रहे
       किंतु पुर्तगाल आसानी से गोवा छोड़ने के मूड में नहीं था वह नॉर्थ अटलांटिक ट्रीटी ऑर्गेनाइजेशन का सदस्य था और भारत के प्रधानमंत्री किसी सैनिक टकराव से गोवा प्राप्त करना नहीं चाहते थे
    किंतु अचानक 1961 के नवंबर महीने में पुर्तगाली सैनिकों ने गोवा के मछुआरों पर गोलियां चलाई जिसमें एक व्यक्ति की मौत हो गई इसके बाद सारा माहौल ही बदल गया तथा भारत के तत्कालीन रक्षा मंत्री केवी कृष्ण मेनन और नेहरु जी ने आपातकालीन बैठक बुलाई इस बैठक के बाद 17 दिसंबर 1961 को भारत ने 30000 सैनिकों को ऑपरेशन विजय के तहत गोवा भेजा इस ऑपरेशन में नौसेना और वायुसेना भी शामिल थी भारतीय सेना की  शक्ति के सामने 36 घंटे में पुर्तगाल ने गोवा से अपना कब्जा छोड़ने का फैसला कर लिया
       इस तरह 19 दिसंबर 1961 को गोवा पुर्तगालियों के कब्जे  से आजाद हुआ किंतु इस को आजाद कराने में 1946 से 1961 तक भारत के अनेक लोगों का खून बहा है तथा अनेक लोग जेलों में बंद रहे जहां उन्हें भयंकर अत्याचार सहन करना पड़े एवं अनेक लोग स्थाई रूप से अपंग हो गए
       आज की पीढ़ी  गोवा को एक पिकनिक स्पॉट या केवल घूमने फिरने और आनंद का स्थान ही समझती है किंतु इसकी आजादी के लिए जिन्होंने खून बहाया एवं शहीद हुए उनकी जानकारी भी देश को मिलना चाहिए और वहां घूमने जाने वाले लोगों से मेरा अगर है की उन शहीदों के प्रति भी गोवा की धरती पर श्रद्धा सुमन अर्पित कर धन्यवाद ज्ञापित करना चाहिए
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 गोवा मुक्ति आंदोलन में मालवा तथा मंदसौर- नीमच जिले  विशेष योगदान रहा है क्योंकि उज्जैन के राजा भाऊ महाकाल गोवा मुक्ति आंदोलन में शहीद हो गए थे तथा मंदसौर के पूर्व विधायक श्री गजा महाराज के पंजे की पांचों उंगलियां कट गई थी इसके साथ ही मंदसौर के ही स्वर्गीय रामचंद्र जी भाया एवं श्री मिश्रीलाल फांफरिया तथा नीमच से पूर्व विधायक खुमान सिंह शिवाजी एवं गरोठ के मोहनलाल जी सेठिया ने भी इस आंदोलन में भागीदारी की थी