चंबल योजना को लेकर उठे सवाल

महावीर अग्रवाल
मंदसौर ३ जून ;अभी तक;  पूर्व मंत्री श्री नरेन्द्र नाहटा ने अपने फेसबुक पेज पर मंदसौर शहर के नागरिकों को पेयजल उपलब्ध करवाने वाली चंबल योजना को लेकर जो लिखा है वह शासन के लिए मंथन कर ठोस कदम उठाने के लिए पर्याप्त है।
  उन्होंने लिखा है आज नईदुनिया के प्रथम पृष्ठ की खबर है चम्बल के पानी से तेज दौड़ रही भ्रष्टाचार की धारा। मंदसौर में जलप्रदाय के लिए चम्बल से पानी लाने की योजना बनी। 53  करोड़ ( पता नहीं सही आंकड़ा क्या है ) लगे। इसमें प्रशासन का खर्च जोड़िये , प्रस्ताव बना ऊपर तक गया पास हुआ।  सबका खर्च।   योजना असफल हो गई।  इसके पहले मंदसौर में काला भाटा  बांध परियोजना पर काम हुआ।  बताया गया,35 करोड़ लगे। योजना असफल हो गई।  श्रेय  की लड़ाई सब लड़ते रहे।  असफलता का उत्तरदायित्व लेने को कोई नहीं।
  दैनिक भास्कर पिछले कुछ महीनों से शिवना के प्रदूषण पर  प्रतिदिन चौथाई पृष्ठ  लिख रहा है। दैनिक  पत्रिका तो व्यवस्था पर वार करता ही रहता है।  स्थानीय अखबार भी यदा कदा  लिखते रहते है।  किसके कानों पर जूं  रेंगी l  न  उनके जो जवाबदार है न उनके जो इस व्यवस्था से पीड़ित है।
जब मै लिख रहा हूँ तब जानता हूँ मेरे लिखने का परिणाम क्या होगा।  मेरे पार्टी के कुछ  मित्र मेरी बात का समर्थन करेंगे विपक्ष कहेगा कि आपके जमाने में भी ऐसा हुआ था।  यह लड़ाई राजनैतिक दलों की नहीं ईमानदारी बनाम भ्रष्टाचार की है।जनता कहेगी यह  नेताओं की   लड़ाई है  बात ख़तम।  यही वे चाहते है जो इस गोरखधंधे में शामिल है।  चाहे नेता हो या अधिकारी या ठेकेदार l   88 करोड़ जनता के पानी में चले गए  और पानी नहीं मिला। यही हाल दूसरी नगर पालिकाओं और  नगर पंचायतो या अन्य संस्थाओ का है।  उनकी योजनाओं के हाल भी  सब जानते है। 88 करोड़ में अपनी अपनी संस्थाओ की असफल योजनाओ की राशि जोड़िये l  आप इतने से लुट गए।  और चुप रहे।
  एक  पक्ष और है।  निष्ठावान कार्यकर्ताओं का , जो दोनों पार्टियों में है।   कभी कभी गुट इस बात पर भी बन जाते है ।  ईमानदारी बनाम बेईमानी।तब यह सकारात्मक होता है।  परन्तु  अनुशासन  के नाम पर चुप हो कर हम किसका भला कर रहे है।   वह तो घुटता रहा जिसे यह पसंद नहीं था। वह व्यवस्था से बाहर हो गया।   अब खुला मैदान है।  ईमानदारी से चिंतन कीजियेगा। राजनीति की संस्कृति बदल गई ।  राजनीति का मकसद बदल गया है। दुःख  इस बात का है कि चुनाव जीतने के चक्कर में इसे नेतृत्व का संरक्षण भी मिलने लगा।
  इसका  सबसे बड़ा कारण है जनता का इस व्यवस्था को  स्वीकार कर लेना है ।  मैने अनेक शिक्षित मित्रों को यह कहते सुना  राजनीति और प्रशासन में यह तो होगा ही।  जब आप ही इसे स्वीकार कर लेंगे तो बदलेगा कैसे।  जब आप ऐसा बोलते है तो आप उस व्यक्ति को हतोत्साहित करते है जो आज भी धारा के विरुद्ध संघर्ष कर रहा है।  अच्छे  लोग  राजनीति में भी है , व्यापार में भी और प्रशासन में भी।वे सब इस व्यवस्था से  परेशान है।  हमारा स्तर इतना गिर गया है कि रेत , गिट्टी , पानी के टैंकर और प्रतीक्षालय तक ।  मै  कमाई की बात नहीं कर रहा , उस पद की बेइज्जती की बात कर रहा हूँ जो हो रही हैं  l
चम्बल योजना मुझे लग रहा था असफल होगी।  मैंने  जिला कमेटी में बात की थी । सरकार का  हर निर्णय ठेकेदार के पक्ष में गया। यदि ठेकेदार सही था तो अधिकारी गलत थे ।किसी पर तो जवाबदारी आती।   मेरी इस  जिद पर  कि  मेरी  बात को मीटिंग की कार्यवाही विवरण में शामिल किया जाए मैं कमेटी से बाहर हो गया।  व्यवस्था तो वैसे ही  चलती रही।  शिलन्यास भी हुआ , उद्घाटन भी ,  पर पानी  ,रुकिए , थोड़े दिनों में बरसात आ ही जायेगी।
 श्री नाहटा ने बेबाकी से भ्रष्टाचार पर प्रहार करते हुए बड़े ही सुंदर शब्दों में लिखा है कि बहुत  पहले राज कपूर की एक फिल्म आई थी , आवारा।  जिनने देखी  हो उन्हें याद होगा।  फिल्म का अंतिम दृश्य है राजकपूर एक चोरी के इलज़ाम में सजा काट कर जेल से  बाहर निकलते है।  बाहर मां  खड़ी  है।  राज कपूर मां  से कहते है।  जिस दिन मै  स्कूल से अपने दोस्त का  रबर चुरा  कर लाया था , काश तू उस दिन मुझे रोक लेती तो  मै  चोर नहीं बनता ,मुझे जेल नहीं जाना पड़ता।  प्रजातंत्र में जनता ही तो मां है।  मै भी प्रजातंत्र की मां से कहना चाहता हूँ काश तू  धर्म , जाति के चक्कर या   दूसरे  लालच में नहीं पड़ती, थोड़ा बोल लेती , कुछ  प्रश्न कर लेती तो तेरे यह करोडो रुपए भ्रष्टाचार जेब में नहीं जाते।   विचार कीजिये