चौकस हुए कलेक्टर और जनप्रतिनिधि लेकिन इलाज के नाम पर जो आर्थिक भार पड़ रहा है उसमे कितनी राहत के कदम उठाए यह भी तो जरूरी है

महावीर अग्रवाल
मन्दसौर १२ सितम्बर ;अभी तक;  नवागत जिला कलेक्टर गौतम सिंह द्वारा वार्ड नंबर 34 में डेंगू को लेकर लोगों को वे इस प्रकार प्रत्यक्ष मिल कर दे रहे है समझाइश । वे नगर में पैदल घूम कर लोगो मे जागरूकता का अलख भी जगा रहे है । मन्दसौर आने के बाद जब उन्हें पता चला कि यहां डेंगू बढ़ता जा रहा है , लोग परेशान है । अस्पताल में मरीजो की भीड़ बढ़ती जा रही है । डॉक्टरों की कमी है । यह सब जानने के बाद उन्होंने नगर पालिका को लगाई फटकार और सम्बंधित अधिकारियों को कसा और बस वे निकल गए नगर में पैदल भ्रमण कर स्थिति जानने के लिए। इधर डॉक्टरों की संख्या बढ़ी तो उधर चिकित्सा में सुधार शुरू हुए। व्यवस्था को देख लोगो मे संतोष की उम्मीद बनी होगी। गरीब जो महंगी चिकित्सा से परेशान है उसे कितनी सुविधा व मदद मिली होगी यह समय पर पता चलेगा लेकिन जितनी मेहनत से जो व्यवस्था की जा रही है  वह कही न कही प्रशंसा को आगे बढ़ा ही रही होगी ।बढ़ते डेंगू के प्रकोप के चलते आज कलेक्टर द्वारा इस बीमारी से लड़ने के साथ ही साफ सफाई के लिए प्रेरित किया जा रहा है ।साफ सफाई के मामले में नगर पालिका यदि समय पर ध्यान दे देती तो शायद आज एक समस्या तो कम होती।
             सांसद श्री सुधीर गुप्ता की भी एक फटकार जब नगर पालिका के लिए एक बैठक में सामने आई तो शायद यह अपने प्रकार की पहली फटकार होगी और इसकी किरणे कितनी दूर – दूर तक जाएगी इसका पता तो बाद में चलेगा लेकिन हा इतना जरूर कहा जा सकता है कि इसका असर तात्कालिक तो जरूर होगा। वैसे ऐसी फटकार समय – समय पर और भी चलती रहे तो निश्चित मानिए जहां काम समय पर पूरे होंगे वही कुछ गुणवत्ता में सुधार की उम्मीद भी की जा सकती है।

              कोरोना से जनता दो वर्ष से परेशान है। इन दिनों कोरोना का आतंक कम हुआ है तो कच्चे- पक्के कोई दो माह से नागरिक डेंगू व बुखार से पीड़ित है। इनकी संख्या बढ़ती गई और उधर चिकित्सा जगत अपनी पूरी लापरवाही रहा। लोगों की भीड़ जिला चिकित्सालय में बढ़ती गई। ओपीडी में डॉक्टरों के नही मिलने पर मरीज परेशान रहे।चिकित्सा तो निजी चिकित्सालयों की हो या शासकीय दोनो मरीजो की आर्थिक चमड़ी उधेड़ने में कम नही रही।शासकीय चिकित्सालय में भी इस बुखार के इलाज के इलाज के लिए भर्ती हुए मरीजो की जांच के नाम पर जो खर्चा हुआ और हो रहा होगा यह वे ही जाने।लेकिन जब किसी भुक्त भोगी से सुनते ही तो आश्चर्य होता है।
            कोरोना के इलाज के लिए मरीज अस्पताल दर अस्पताल भटकते रहे और जब इलाज का खर्च सामने आया तो कोरोना से बचे लोग और उनके परिजन है जाने।
            कोरोना की बीमारी और अभी उससे पूरी तरह निजात पाने की खबर के बिना अब ये डेंगू का प्रहार आ गया।कोरोना के इलाज की भारी आर्थिक मार से गरीब और मध्यम वर्गीय परिवार उभरे ही नही की डेंगू से मानो चिकित्सा जगत के मन माने आर्थिक भार से लोग कराह उठे हो तो कोई आश्चर्य नही ।कुछ लोगो से यदि दीपावली के द्रश्य की चर्चा सुनो तो क्या गलत है। पैथालॉजी लेब के विभिन्न जांचों के खर्च सुनकर लोग चोक जाते है लेकिन क्या करे डॉक्टर ने जांच जो लिखी है।
             लोकतंत्र में महंगे ईलाज का नेता कोई ईलाज नही कर सके ।लोगो को मजबूरी में भुगताना और भुगता ही है ।वाह क्या मानो आर्थिक भूकम्प ।कई मध्यम वर्गीय गरीबी रेखा के नीचे  आ गए लेकिन हां कई चिकित्सा जगत आर्थिक रूप से सुदृढ़ हो गए हो तो यह भारत सरकार की सर्वे रिपोर्ट ही बता पाएगी लेकिन हां लोगो मे तो इस सदी की यह महत्वपूर्ण चर्चा है।
                 एक कहावत है जब जागे तब सवेरा। हा मन्दसौर में तो यह कहावत सही बता रही है। कोरोना के बाद इस वर्ष 21 के पूरा होने के पूर्व डेंगू ने ऐसा धावा बोला कि कई गली मोहल्लों में इसका आतंक हो गया। फिर एक बार चिकित्सा व्यवस्था चरमरा गई। नए कलेक्टर श्री गोतमसिंह का आगमन हुआ। उन्हें पता लगा तो उन्होंने प्रशासकीय कमान कसी और खुद उतर गए मैदान में। निश्चित रूप से सुधार के दर्शन शुरू हुए। शासकीय अमला चौकस हुआ। सांसद श्री सुधीर गुप्ता ने जिन्हें फटकार लगाना थी लगाई। विधायक श्री यशपालसिंह सिसोदिया ने भी कदम उठाए। लो हो गए एक समन्वित प्रयास। हा पर आर्थिक रूप से मरीजो को कितनी राहत इस महंगी चिकित्सा के युग मे मिली या मिल पाएगी यह अभी अपेक्षित है।