जनजातीय किसान महिलाओं ने बनाई रेशम उत्पादक कंपनी (एफपीओ)

मयंक भार्गव

बैतूल, 13 नवंबर ;अभी तक;  बैतूल जिले में रेशम उत्पादन की अपार संभावनाओं को देखते हुए चार विकासखंडों के 40 जनजातीय बाहुल्य गांवों की 755 जनजातीय किसान महिलाओं ने रेशम उत्पादक कंपनी (एफपीओ) का गठन किया है। प्रत्येक किसान महिला एक एकड़ में शहतूत पौधरोपण से लगभग 70 से 80 हजार रुपए की वार्षिक आमदनी प्राप्त कर रही हैं। प्रदेश में रेशम उत्पादन के क्षेत्र में जनजातीय महिलाओं द्वारा बनाई गई यह कंपनी स्वयं में अनूठी है। कंपनी को दिल्ली में ऑल इंडिया बिजनेस डेवलपमेंट एसोसिएशन द्वारा सम्मानित भी किया जा चुका है।

प्राप्त जानकारी के अनुसार जिले के जनजातीय बाहुल्य घोड़ाडोंगरी, शाहपुर, चिचोली एवं बैतूल विकासखंड के 40 गांवों की जनजातीय महिलाओं द्वारा 2016 में सतपुड़ा वूमन सिल्क प्रोड्यूसर कंपनी लिमिटेड पंजीकृत कराई गई, जिसका मुख्यालय पाढर में है। इस कंपनी में 755 रेशम उत्पादक जनजातीय किसान महिलाएं अंशधारक के रूप में शामिल हैं। इन किसान महिलाओं के परिवार एक एकड़ सिंचित भूमि में शहतूत का पौधरोपण कर वर्ष में चार बार शहतूत की पत्ती की पैदावार करके शहतूत रेशम कीटपालन द्वारा कोया की फसल का उत्पादन करते हैं। जिससे एक महिला के परिवार को 70 से 80 हजार रुपए की वार्षिक आमदनी होती है। शहतूत का एक बार पौधरोपण 15 वर्ष तक गुणवत्तापूर्ण पत्तियों की उत्पादकता देता है। इन किसान महिलाओं द्वारा उत्पादित कोया कंपनी द्वारा 400 रुपए प्रतिकिलो तक की दर से खरीदा जाता है।

कंपनी द्वारा जिले में रेशम गतिविधियों को बढ़ाने के उद्देश्य से कंपनी द्वारा कार्यशील पूंजी भी व्यय की गई है, जिससे घोड़ाडोंगरी जनपद पंचायत के ग्राम छुरी, शाहपुर जनपद पंचायत के ग्राम खोकरा, रामपुर, भग्गूढाना एवं आवरिया तथा बैतूल विकासखंड के ग्राम सिल्लौट, झाडक़ुण्ड एवं ग्यारसपुर में आठ चॉकी कृमि पालन भवन स्थापित किए गए हैं। इसके अलावा शाहपुर विकासखंड अंतर्गत रामपुर में दो एवं सेहरा में एक रीलिंग यूनिट की भी स्थापना की गई है। जिनके माध्यम से किसानों को उचित दर्जे की चाकी देकर गुणवत्तापूर्ण कोया का उत्पादन किया जाता है। किसान महिलाओं द्वारा स्वयं ही रीलिंग करके उच्च गुणवत्ता का रेशम धागा भी तैयार किया जाता है। इन रीलिंग यूनिट्स के माध्यम से 40 भूमिहीन जनजातीय महिलाओं को भी रोजगार प्रदान किया जाता है, जिनकी मासिक आय पांच से छ: हजार रूपए महीना होती है।

जिले के जनजातीय विकासखंडों में शहतूत उत्पादन से जुड़े इन आदिवासी परिवारों में समृद्धि आ रही है एवं इनका अन्य स्थानों पर रोजगार के लिए पलायान भी रूका है। इन परिवारों के रहन-सहन में बदलाव आया है एवं बच्चे भी अब बेहतर शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं, जिससे बच्चों को शहरी क्षेत्र में रोजगार की संभावनाएं बढ़ी है।

शहतूत उत्पादन से जुड़ी जनजातीय महिलाओं के प्रत्येक के खेत में रेशम विभाग द्वारा एक लाख 37 हजार 500 की लागत वाले कृमि पालन भवन बनवाए गए है। इसके अलावा प्रत्येक हितग्राही को 37 हजार पांच सौ रुपए के कृमि पालन उपकरण, 18 हजार 750 रुपए लागत की सिंचाईं सुविधाएं एवं 15 हजार लागत मूल्य के पांच हजार पांच सौ पौधे शहतूत के पौधे उपलब्ध कराए गए है। इसके अलावा रेशम विभाग द्वारा प्रत्येक फसल पर विसंक्रमण सामग्री एवं आवश्यक अंडीपुंज भी उपलब्ध कराए जाते हैं। इस सबके फलस्वरूप शहतूत उत्पादन से जुड़ी इन महिलाओं के जीवन में आर्थिक रूप से समृद्धता आ रही है एवं अब वे खुशहाल जीवन जी रही हैं। इनके द्वारा उत्पादित रेशम कर्नाटक, उत्तरप्रदेश, बंगाल एवं तमिलनाडु जैसे राज्यों में भी विक्रय के लिए भेजा जाता है।

कलेक्टर द्वारा किया गया अवलोकन

कलेक्टर श्री अमनबीर सिंह बैंस द्वारा विगत दिनों को चॉकी केन्द्र छुरी एवं रेशम धागा निर्माण ईकाई रामपुर का भ्रमण कर यहां रेशम उत्पादन व रेशम धागा निर्माण प्रक्रिया का अवलोकन किया जा चुका है। इस दौरान उन्होंने जिले में बड़े पैमाने पर रेशम उत्पादन की संभावनाओं पर भी अधिकारियों से चर्चा की है। साथ ही कहा है कि जिले में रेशम उद्योग को बढ़ावा देने के लिए प्रयास किए जाएं। रेशम उत्पादन से ज्यादा से ज्यादा ग्रामीणों को जोड़ा जाए।