जिसके परिणाम सुखदायी हो वो मंगल कहलाता है -जैनाचार्य श्री विजयराजजी म.सा.

महावीर अग्रवाल
मन्दसौर ६ नवंबर ;अभी तक; हर व्यक्ति अपना मंगल चाहता है, मंगल का अर्थ है जो अवरोध हमारे विरोध में खड़े है उन्हें अपने सहयोग में बदल देना यही मंगल है। लौकिक दृष्टि से अक्षत, कुंकुम, स्वस्तिक, दर्पण, जलघट, मौली को मंगल मानते हैं, ये लौकिक मंगल जड़ होते हैं, इनको अपने मंगल-अमंगल का कोई स्वरूप बोध नहीं होता, जिसे मंगल होने का स्वरूप बोध होता है वह भाव मंगल कहलाता है, अहिंसा, संयम और तप ये धर्म मंगल है ये ही परम मंगल होते हैं जो अपने जीवन में धर्म मंगल करता है उसमें विघ्न बाधाएँ स्वतः ही दूर हो जाती हैं, धर्म इसलिये मंगल है क्योंकि उसके परिणाम सदैव सुन्दर और सुखदायी होते है। जिसके परिणाम दुःखदायी हो वह कभी मंगल नहीं होता।
                    ये विचार शास्त्री कॉलोनी स्थित नवकार भवन में विराजित जैनाचार्य श्री विजयराजजी म.सा. ने प्रसारित अपने उद्बोधन में कहे। आपने कहा-धर्म उत्कृष्ट मंगल है जो अपने जीवन में धर्म को धारण करता है उसके हर अमंगल मंगल में बदल जाते है, किसी को दुःख न देना वरन् सबको सुख देने का भाव रखना धर्म है, ऐसा धर्म मंगल जीवन के सारे दुःख द्वन्द्वों का निवारण करता है। मरण भय सबसे बड़ा भय होता है जो मरण भय से भयभीत जीवों को अभयदान देता है वही दान सभी दानों में उत्तम और मंगलदान कहलाता है। मरण भय से छुटकारा अहिंसा से प्राप्त होता है, अहिंसक व्यक्ति का संकल्प होता है-सभी जीवों के साथ मेरी मैत्री हो, वह किसी को अपना शत्रु नहीं मानता, जहाँ शत्रुता का भाव नष्ट हो जाता है वहां सारे अमंगल दूर हो जाते है, मैत्री का संकल्प सबसे बड़ा मांगलिक संकल्प होता है, इसी से मन निर्विकार और निर्विकल्प बनता है। जो मन की प्रसन्नता को अभिव्यक्त करता है। व्यक्ति का जब संकल्प ही मंगल होता है तब सारे अमंगल स्वतः शांत हो जाते है। मंगल करने से ही मंगल नहीं होता जब जीव मैत्री का भाव परिपक्व होता है तब मंगल होता है।
                     आचार्य श्री ने कहा- जीवन में मंगल की कामना सभी करते हैं मगर सभी का मंगल नहीं होता क्योंकि वे पाप का त्याग नहीं करते, पाप अमंगल है और धर्म मंगल है। यह बात समझते हुए भी बहुत सारे लोग पाप का त्याग नहीं कर पाते, पापों का आचरण ही पतन का कारण बनता है। जीवन में सच्चा मंगल वह है जो आत्म-शुद्धि की ओर ले जाए। जो आत्मा को मलीन, अशुद्ध करता है वह मंगल नहीं हो सकता। अरिहंत, सिद्ध, साधु और धर्म ये चारो सर्वोत्कृष्ट मंगल है जो इनका ध्यान लगाता है और इनकी आज्ञाओं में अपना जीवन समर्पित करता है वह परम मंगल स्वरूप बन जाता है।
आचार्य श्री ने कहा मंगल ग्रह पर जाने से मंगल नहीं होता, जहां मानव रहता है वहां मंगल होता है बशर्ते वह पापकारी कार्यों का परित्याग कर दें। मंगलवार को व्रत रखें और अन्य वारों को होटल और बोटल की ओर भागे तो कभी मंगल नहीं होता। व्रत करें या न करें मगर भाव शुद्ध रखेंगे तो मंगल ही मंगल होगा। जिनके मंगल होता है उनके ही आनंद होता है। मंगल के साथ ही आनंद जुड़ा रहता है। जो आनंद की चाह करते है उन्हें मंगल के काम करने चाहिए। यही शाश्वत सत्य है।

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