जीवन में मर्यादाओं का पालन करना आवश्यक-आचार्य श्री पियुषभद्रसूरिश्वरजी म.सा.

7:14 pm or August 4, 2022

महावीर अग्रवाल

मन्दसौर ४ अगस्त ;अभी तक;  मनुष्य जीवन में मर्यादाओं का अपना विशिष्ठ स्थान है। मर्यादाओं का पालन करने के कारण ही राम मर्यादा पुरूषोत्तम कहलाये। जीवन में मर्यादा नहीं है तो आपका जीवन नैतिक पतन की ओर जा सकता है। पाश्चात्य संस्कृति के प्रभाव व टेलीविजन-मोबाईल के अत्यधिक उपयोग ने मर्यादाओं को कम करने का काम किया है। घर परिवारों में बहु-बेटियां छोटे-छोटे कपड़े पहन रही है। कपड़ों का उद्देश्य तन ढकना होता है लेकिन अब कपड़े पहनने का उद्देश्य फैशन दिखाना हो गया है। माता-पिता, भाईयों को चाहिये कि वे घर-परिवार में मर्यादा का स्वयं भी पालन करें तथा दूसरों को भी मर्यादित जीवन जीने हेतु प्रेरित करे।

उक्त उद्गार परम पूज्य जैन आचार्य श्री पियुषभद्रसूरिश्वरजी म.सा.  ने नईआबादी स्थित आराधना भवन मंदिर हाल में आयोजित विशाल धर्मसभा में कहे। आपने गुरूवार को आयोजित धर्मसभा में कहा कि रामायण व महाभारत जैसे ग्रंथ केवल ग्रंथ नहीं बल्कि मर्यादा का जीवन जीने की प्रेरणा देने वाले अमूल्य शास्त्र है। प्रभु राम ने जीवन भर मर्यादाओं का पालन किया। सीता, लक्ष्मण व हनुमान सहित रामायण के सभी पात्र मर्यादा में जीवन जीने की प्रेरणा देते है। महाभारत ग्रंथ में भी मर्यादाओं की सीख दी गई है। द्रोपदी के पांच पति थे एक दृष्टान्त के अनुसार जब द्रोपदी युधिष्ठिर के साथ कक्ष में थी  तब अर्जुन कक्ष में प्रवेश कर नियम का उल्लंघन किया था, अर्जुन ने इस गलती के पश्चाताप स्वरूप एक निश्चित अवधि के लिये वनवास ले लिया था। उस समय मर्यादा का पालन इतना जरूरी होता था लेकिन वर्तमान समय में घर परिवारों में मर्यादायें समाप्त हो रही है । घर की बहु-बेटियां आधे अधुरे कपड़े पहनकर घर में व घर के बाहर घुमती है लेकिन माता-पिता उसे कुछ नहीं कहते, युवा लड़के देर रात्रि घर पर आते है। माता-पिता उसे नहीं टोकते। यदि माता-पिता संतान के कपड़ों एवं उसके रहन सहन पर ध्यान नहीं देंगे तो मर्यादायें कैसे बची रहेगी। आजकल तो मंदिर व धर्मस्थानों पर भी लोग कुछ भी कपड़े पहनकर आ जाते है। यह उचित नहीं है। अपने कमरे में कुछ भी पहनों चल सकता है लेकिन कमरे के बाहर जब भी निकलो मर्यादित कपड़ों में निकलो। आधे अधुरे  कपड़े पहनकर बाहर मत निकला। बाल्यावस्था के बाद युवक युवति क्या कपड़े पहन रहे है इसका ध्यान माता-पिता को रखना चाहिये। संतान के सदाचार व शील की रक्षा करनी है तो उसे ढंग के कपड़े पहनाने जरूरी हैं, कपड़े आपके चरित्र का दर्पण है, कपड़े सलिके से पहनोगे तो चरित्र में भी दिखेगा।

                       जहां प्रीति है वहीं उत्पत्ती है- धर्मसभा में आचार्यश्री ने कहा कि जहां प्रीति अर्थात राग होता है वहां हमें बार-बार जन्म लेना पड़ता है। जिस पदार्थ में हमारी आसक्ति है , हो सकता है अगले भव में हमें उसी पदार्थ में जन्म लेना पड़े। बार-बार जन्म मृत्यु से बचना है तो सर्वप्रथम राग (आसक्ति) से बचना पड़ेगा। धर्मसभा में बड़ी संख्या में धर्मालुजन उपस्थित थे। धर्मसभा के उपरांत पारसमलजी किलोस्कर परिवार की ओर से प्रभावना वितरित की गई। धर्मसभा का संचालन दिलीप रांका ने किया।