झूठ आवश्यकता की परिधि में सत्य नहीं हो सकता -जैनाचार्य श्री विजयराजजी म.सा.

महावीर अग्रवाल
मन्दसौर १५ सितम्बर ;अभी तक;  व्यावहारिक जीवन की शुद्धता और प्रबुद्धता पर धार्मिक जीवन की निष्ठा व प्रतिष्ठा टिकी हुई है उसे शुद्ध और प्रबुद्ध बनाये रखने वाला व्यक्ति कभी झूठी साक्षियाँ देकर दूसरों के जीवन को संकट में नहीं डालता। झूठी साक्षी देकर वह अपने जीवन को भी नारकीय जीवन बना डालता है। नारकीय यातनाओं से ऐसा व्यक्ति भी नहीं बच सकता। एक झूठ को सिद्ध करने के लिये व्यक्ति को दूसरे झूठ का सहारा लेना पड़ता है। उसे झूठ का बड़ा जाल बिछाना पड़ता हैं झूठ तो हर परिस्थिति में झूठ ही होता है, उसे आवश्यकता का नाम देकर सत्य साबित नहीं किया जा सकता। कई सभ्य लोग उसे आज की आवश्यकता की परिधि में लेते हुए सत्य का जामा पहनाने के लिये तत्पर हो जाते हैं मगर यह उनका अपने साथ व दूसरों के साथ धोखा ही होता हैं। झूठ आवश्यकता की परिधि में सत्य नहीं हो सकता। झूठ और कपट ग्रीष्म ़ऋतु की लू की तरह सब जगह व्याप्त है। यही कारण है कि जनजीवन भारभूत बनता जा रहा है। जहां झूठ को प्रश्रय मिलता है वहां हिंसा कहीं कहीं से आ ही जायेगी, झूठ का कपट के साथ और कपट का हिंसा के साथ गहरा सम्बन्ध होता है, इसीलिये झूठी साक्षियां देने वाला न हिंसा से बच सकता है और न कपट से। उसे एक नहीं अनेक पाप अपने जीवन में करने पड़ जाते है।
                 ये विचार शास्त्री कॉलोनी स्थित नवकार भवन से विराजित प्रखर वक्ता जैनाचार्य श्री विजयराजजी म.सा. ने 15 सितम्बर, मंगलवार को प्रसारित अपने संदेश में कहे। आपने कहा-झूठ का विकार विष बेल की तरह बढ़ता ही जाता है, उसके कटू परिणाम व्यक्ति को इसी जन्म में भोगने पड़ते है। कई बार इस जनम में अगर वह बच जाता है तो पुनर्जन्म जहां भी होता है वहां उसे भोगना पड़ता है। झूठ स्वयं में अंधकार होता है और झूठ जीवन के अंधकार की ओर ले जाता है। झूठ भी झूठ के सहारे नहीं वह भी सत्य की बैशाखियों पर चलता है। झूठ बोलकर समाज हित की कामना करना अपने आपको विभ्रमित करना है, झूठ से सारे कार्य सम्पादित नहीं होते, सत्य से हर कार्य आसानी से सम्पन्न होते है। झूठ बोलना और झूठी साक्षियां देना दोनों ही मानवीय जीवन की दुर्बलताएं है, जो मानसिक पक्ष को कमजोर साबित करती है। झूठ अधिक दिनों तक नहीं चलता उसकी उम्र बहुत छोटी होती है, वह जितना चलता है तो सत्य का आवरण लेकर ही चलता है। सत्य दीर्घजीवी होता है उसे कोई काट नहीं सकता, असत्य कभी टिकता नहीं सत्य कभी मिटता नहीं, सत्य में शक्ति है, शांति और सुरक्षा है, जीत अंत में सत्य की ही होती है। हर व्यक्ति को सत्य पर आस्थाशील होना चाहिए।
आचार्य श्री ने कहा- वही समाज और राष्ट्र समुन्नत होता हैं जहां के नागरिक झूठ नहीं बोलते। सत्य बोलते है, सत्य सोचते है और सत्य के लिये जीते है। सत्य की शक्ति पर जिसको विश्वास होता है वह निष्कपट और निष्कलुष होता है। यही उसके लिये शांति-समाधि व संतुष्टि देने वाला होता है। झूठी साक्षियां देना मानवता नहीं यह पामरता है जो मानव मानवता में विश्वास करता है वह क्षुद्र स्वार्थों की पूर्ति के लिये ऐसा घोर पाप कर्म नहीं करता। वह सत्य का पुजारी बन सत्य की साधना करता हुआ असीम शांति व संतोष की अनुभूति करता हैं। कोविड महामारी के चलते हर मानव को झूठ का त्याग और सत्य का अनुराग करना चाहिए। सत्य भगवान है और भगवत्प्राप्ति का मार्ग है।

 

 

Related Articles

Post your comments

Your email address will not be published. Required fields are marked *