तनाव ही जीवन को पतन की ओर धकेलते है -जैनाचार्य श्री विजयराजजी म.सा.

महावीर अग्रवाल
मन्दसौर २ नवंबर ;अभी तक; तनाव हमारी सदी का सबसे बड़ा अभिशाप है, इससे लगभग सब परिचित है और तकरीबन सभी इसके शिकंजे में है, गलत फहमी तनाव की माँ है, असंतोष इसका पिता, आशंका इसका कारण है, रोग, शोक, चिंता, भय इसके परिणाम है, तनावों की जिंदगी बोझ भरी और कष्टदायी होती है, यह पहले मन पर छाते है फिर तन को जकड़ लेते हैं। सुख, सुविधा और जल्दी पैसा पाने की लालसा से ये जल्दी फैलते है, एक बार तनाव जीवन में घुस जाते हैं तो फिर जल्दी से नहीं निकल पाते। तनावों के रहते व्यक्ति की मौलिकताएं अवरूद्ध हो जाती है, उस पर औपचारिकताएं हावी हो जाती है, उसका बोलना, चलना, हंसना, मेलमिलाप करना सब में औपचारिकताएं आ जाती है, शांत की सारी संभावनाएं क्षीण हो जाती है, अशांक व उत्तेजना का वह शिकार हो जाता है। तनाव जीवन की त्रासदी है, जीवन को त्रस्त, अस्त व्यस्त और किं कर्तव्य विमूढ़ बना देते है।
                  ये विचार शास्त्री नगर स्थित नवकार भवन में विराजित जैनाचार्य श्री विजयराजजी म.सा. ने ‘तनाव अभिशाप या वरदान’ विषयक परिचर्चा के प्रसारण में कहे। आपने कहा तनाव अभिशाप ही है ये कभी वरदान नहीं बनते, वरदान तो जीव को और जीवन को ऊँचा उठाने का काम करते हैं, तनावों ने आज तक किसी को ऊँचा उठने नहीं दिया ये व्यक्ति को भीतर से विखंडित कर देते हैं, ऊपर से व्यक्ति स्वस्थ दिखता है मगर भीतर ही भीतर वह रोता है। तनावों ने जीवनी शक्ति को मटियामेट कर दिया है, रिश्तों को असंतुलित कर दिया है। रिश्ते वे मधुर होते हैं जिनमें शब्द कम समझ ज्यादा होती है। समझ से बनें रिश्तों में तकरार कम प्यार ज्यादा होता है। रिश्तों में आस कम विश्वास ज्यादा और दिखावा कम आत्मीयता अधिक होती है। तनावों के चलते अशांति अपने पाँव जमा लेती है-चारों और निराशाएँ छा जाती है। स्वाभाविकताओं के इस तरह आवृत्त हो जाने के कारण वैकारिकताएँ सिर उठा लेती है और अनायास ही हम भूल बैठते है अपने मूल स्वभाव व सत्य को।
                  आचार्य श्री ने कहा- अर्थ की अंधी दौड़ तथा बाजाद वाद में व्यक्ति को तनावों की आग में झौंक दिया है, कितना ही धन बढ़े धमाल मत करो, धन बढ़ता है तो धमाल बढ़ती है फिर धमाल ही तनाव लाती है। आपने कहा जिसमंे परिग्रह की पकड़ नहीं, आग्रह की अकड़ नहीं, खानपान की जकड़ नही वह तनाव मुक्त होता है। तनाव मुक्ति का यह छोटा सा फार्मूला है जो इसे अपना लेता हैं वह कभी तनावों के घेरे में नहीं आता। पकड़ से अकड़ और अकड़ से जकड़ ज्यादा खतरनाक व घातक होती है। धन आते ही सुख मिलेगा इसकी कोई गारंटी नहीं क्योंकि जितना धन बढ़ता है उतनी उसकी पकड़ मजबूत होती है बस यह पकड़ ही तनावों की जड़ है, जिसने इस जड़ को उखाड़ कर फैंक दिया वह तनाव मुक्त हो जाता है। धर्म ही तनाव मुक्ति का मार्ग है, धर्म के आते ही जीवन सुख मय बनता है इसमें कोई संदेह नहीं, धन की वृद्धि हो तो मन को धर्म में लगा दो फिर न कोई उलझन रहेगी न कोई तनाव रहेगा। धर्म आस्था का विषय है और आस्था से होता है।

Related Articles

Post your comments

Your email address will not be published. Required fields are marked *