दीपावली पर्व की पवित्रता को जीवन व्यवहार में लाएँ -जैनाचार्य श्री विजयराजजी म.सा.

महावीर अग्रवाल
मन्दसौर १२ नवंबर ;अभी तक; हमारा देश भारत पर्व प्रधान देश है, इसमें लौकिक और लोकोतर दोनों तरह के  पूर्व मनाये जाते हैं, पर्व खुशी, उल्लास, उत्साह और प्रसन्नता लेकर आते है। दीपावली पर्व पर मात्र दीपकों को ही न सजाएं, दीपक बोलता नहीं जलता है और प्रकाश फैलाता है वैसे ही हर मानव को स्वयं का अंधकार मिटाकर प्रकाश फैलाना चाहिए। दीपावली पर्व की सार्थकता तभी है जब बाहरी घर के साथ भीतरी घर को भी स्वच्छ और प्रकाशित करें। स्वस्थता, प्रसन्नता और सबके साथ मित्रता ये पर्वों का आंतरिक संदेश होता है जो इन संदेशां को आत्मसात करता है वह पर्वों का महत्व समझ लेता है।
                       ये विचार शास्त्री कॉलोनी स्थित नवकार भवन में आयोजित  धर्मसभा में जैनाचार्य श्री विजयराजजी महाराज सा. ने कहे। आपने कहा- हिंसा को छोड़कर व्यक्ति को अहिंसा का मार्ग अपनाना चाहिए। पटाखें छोड़कर कितना वातावरण विषाक्त कर दिया जाता है इसके साथ ही कई निरीह प्राणियों को जान तक खतरें में पड़ जाती है। खुद जीयो और दूसरों को भी जीने में सहयोग दो यह हमारी मानवता है। अपनी क्षणिक खुशी व प्रसन्नता के लिए किसी के लिये संकट बनना अच्छा नहीं है। सभी जीव जीने का हक रखते हैं उन्हें जीवन दान देकर ही हम अपनी मानवता को सुरक्षित रख सकते है। हिंसा, असत्य, असदाचार और आसक्ति का परित्याग करना ही पर्वों की उच्च आदर्श है। आत्म जागृति के बिना इन आदर्शों का आचरण नहीं हो सकता। दीपावली पर्व आत्म जागृति प्रदान करने वाला पर्व हैं जैन धर्म के अनुसार अमावस्या की मध्य रात्रि में तीर्थंकार भगवान महावीर ने शरीर और कर्म के बंधनों को तोड़, शाश्वत स्थान मोक्ष को प्राप्त किया था। उन्हीं की स्मृति में कई श्रावक-श्राविकाएं बेला तप, तेला तप करके उनके प्रति अपनी श्रद्धा-भक्ति को प्रदर्शित करते हैं।
                  आचार्य श्री ने कहा- जो व्यक्ति अपने जीवन व्यवहार में जितना अहिंसक अनाक्त और प्राप्त शक्ति का सदुपयोग करता है वह जीवन की पवित्रता को प्राप्त करता है। पवित्रता शुद्ध आचार-विचार और व्यवहार से आती है न कि रोशनी करने से या सुंदर वेषभूषाएं पहनने से आती है। व्यक्ति की शक्ति निर्दोष होती है उसमें दोष उत्पन्न होते है उसका दुरूपयोग करने से। कुछ धनाढ्य लोग अपने पैसों का प्रदर्शन करने में लग जाते है वे सामाजिक बुराईयों को बढ़ावा देते है, इससे कई तरह के दुराचार पनपने लगते है। पर्व के दिनों में शराब पीना, जुआ, सट्टा खेलना, अमर्यादित व्यवहार करना ये सब आज के शोक हो गये है। शौकिन लोग अपने धन का दुरूपयोग करके कई सामाजिक बुराईयों का सृजन कर देते है, ये पर्व की पवित्रता नहीं कही जाती। दुराचारों से बचना यह सामाजिक समरसता का आदर्श है। सात्विक भय और अनुशासनात्मक भय से ही इन बुराईयों से बचा जा सकता है। बाद का पश्चाताप यदि पहने का विवेक बन जाए तो दुर्घटनाओं से बचाया जा सकता है। हर मानव को विवेकवान, विचारवान और चरित्रवान होना चाहिए। दुगुर्णोें से बचो, जीवन शांत रहेगा-सुखी रहेगा।

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