दुर्भावना ही सारे दुःख-द्वन्द्वों का कारण होती है -जैनाचार्य श्री विजयराजजी म.सा.

महावीर अग्रवाल
मन्दसौर २१ नवंबर ;अभी तक; भगवान महावीर ने कहा- जिस साधक की अंतरात्मा भावना योग से विशुद्ध होती है वह आत्मा जल में स्थित नौका के समान संसार सागर से तिरकर सब दुःखों से मुक्त हो परम् सुख को प्राप्त करता है। भावना अन्तःकरण की प्रवृत्ति है जो अंतःकरण में उत्पन्न होती है और उसी में विलीन हो जाती है, भाव का प्रभाव हर स्वभाव पर होता है इसलिये हर मानव को अशुभ भाव से बचना चाहिए। अशुभ भाव कलुषित, विकृत और अनेक विकृतियों को पैदा करता है। अशुभ भावों से उत्पन्न अशुभ भावना जहां जीव के वर्तमान जीवन को तो बिगाड़ती है वहां वह भविष्य के लिये दुर्गति का कारण बनती है। दुर्गति और दुर्मति का एक मात्र कारण दुर्भावना होती है। इससे बचना और बचाना दोनों जीवन के लिये हितकारी होता है।
                   ये विचार शास्त्री कॉलोनी स्थित नवकार भवन में विराजित जैनाचार्य श्री विजयराजजी म.सा. ने प्रसारित संदेश में कहे। आपने कहा- वर्तमान युग के दौर में दुर्भावना का जोर ज्यादा चल रहा है, लोग दुर्भावना के शिकार बहुत जल्दी हो जाते हैं, इस समय में ईष्यालु, घृणालु, झगड़ालु, शंकालु और आलसी लोगों का बाहुल्य ज्यादा है। जिसके चलते व्यक्ति हर समय दुःखी व द्वंद्वग्रस्त रहते है। भाई भाई के बीच, पिता पुत्र के बीच, सास बहू के बीच यह दुर्भावना अपना आधिपत्य जमा कर बैठी है, कोई घर-कोई मोहल्ला और कोई शहर ऐसा नहीं मिलेगा, जहां इस दुर्भावना रानी का साम्राज्य न हो। अत्र, तत्र सर्वत्र एक छत्र इसका राज है, इस दुर्भावना के कारण आर्थिक सम्पन्नता भी नहीं बढ़ पाती, व्यक्ति मेहनत बहुत करता है, फलस्वरूप जो प्राप्त होना चाहिए वो नहीं होता, ऐसे व्यक्ति शनि के चक्कर में पड़ जाता है। याद रहे-शनि और दुश्मनी दोनों में से दुश्मनी ज्यादा घातक होती है, शनि का प्रभाव तो समय के साथ उतर जाता है पर दुश्मनी सात  जन्म तक पीछा नहीं छोड़ती, दुश्मनी दुर्भावना से पैदा होती है, दुश्मनी मिटाइये शनि अपने आप अनुकूल हो जायेगा। लोग दुर्भावना तो मिटाते नहीं, और जीवन में सुख-सम्पदा और सफलता प्राप्त करना चाहते है जो संभव नहीं।
                    आचार्य श्री ने कहा- सद्भावना से ही परिवार बनते है, सद्भावना से ही संसार चलता है, क्या खूब कहा है एक भाई ने दूसरे भाई के लिये- बड़े अनमोल है ये खून के रिश्ते, इनको तू बेकार न कर, मेरा हिस्सा भी तू ले ले मेरे भाई, घर के आँगन में दिवार न कर। सद्भावना से ही भ्रातृत्व भाव रहता है जहाँ भ्रातृत्व भाव होता है वहां शक्ति, सम्पत्ति, सुख, ऐश्वर्य सब कुछ रहता है। भाई चारे के अभाव में जिंदगी बेस्वाद लगती है। भाई चारे में सब कुछ समाहित रहता है। रावण जब मृत्यु शय्या पर था तो उसने राम से एक बहुत ही बड़ी बात कही- मैं तुमसे हर मामले में बड़ा हूँ, उम्र में, बुद्धि में, बल में, मेरा कुटुम्ब भी तुमसे बड़ा है, मेरी लंका सोने की है, धन-दौलत और राज्य भी तुमसे बड़ा है इन सबके बाद भी मैं तुम से हार गया, जानते हो क्यूं-क्योंकि तुम्हारा भाई तुम्हारे साथ था और मेरा भाई मेरे खिलाफ था। इस सच्चाई से भाई चारे का महत्व उजागर होता हैं सद्भावना ही भाईचारे की सौगात देती है। सबमें भाई चारा बढ़े, यही समय की मांग है।

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