दूसरों से रखी अपेक्षाये ही दुखों का कारण है, इससे बचे- आचार्य श्री पियुषभद्र सूरीश्वरजी म.सा.

6:32 pm or July 25, 2022
महावीर अग्रवाल
मन्दसौर २५ जुलाई ;अभी तक;  मानव जीवन में सुख व दुख दोनों है, जब हम घर परिवार के सदस्यों एवं मित्रों से अपेक्षा रखते है और वे पूरी नहीं होती है तो हमें दुख होता है, दूसरों से रखी अपेक्षायें और उनकी पूर्ति नहीं होना ही दुख का कारण है। जहां अपेक्षायें है वहीं दुख है। जीवन में यदि सुखी रहना है तो दूसरों से अपेक्षा रखना बंद करो और जीवन में समता, समभाव का गुण लाओ।
                       उक्त उद्गार परम पूज्य जैन आचार्य श्री पियुषभद्रसूरिश्वजी म.सा. ने नईआबादी स्थित आराधना भवन मंदिर में सोमवार को आयोजित धर्मसभा में कहे। आपने कहा कि कई बार मनुष्य के पास धन सम्पत्ति सब कुछ होता है लेकिन उसे उम्मीद के मुताबिक सम्मान नहीं मिलता है तो उसके पास धन होते हुए भी दुःख होता है लेकिन दूसरी और संत या ज्ञानी व्यक्ति के जिसे पास धन नहीं है वह व्यक्ति भी सुखी होता है क्योंकि वह व्यक्ति दूसरों से अपेक्षा नहीं रखता, न तो धन की न यश की। इसलिये जीवन में अपेक्षायें रखना छोड़े तभी सुखी रहेंगे।
                 समता व समभाव का जीवन ही उत्तम है- आचार्य श्री ने कहा कि समता व समभाव का गुण ही जीवन में शाश्वत सुख देता है तथा यही जीवन उत्तम जीवन है। जैन आगमों में भी समता व भाव के गुणों की व्याख्या की गई है।
                  सांसारिक सुख नहीं, आत्म सुख (शाश्वत सुख) की कामना करो- आचार्य श्री ने कहा कि यदि किसी जैन संत के पास आप जाते है तो वे धनवान बनो, पुत्र के माता-पिता बनो ऐसे आशीर्वाद नहीं देते है क्योंकि ये केवल सांसारिक सुख के कारण है, जैन संत व जिन शासन आपके शाश्वत सुख की कामना के लिये आपको आशीर्वाद देते है, इसलिये जीवन में सांसारिक सुख को नहीं आत्मसुख (शाश्वत सुख) को महत्व दो।
                  अध्यात्म का मार्ग श्रेष्ठ है- आचार्य श्री ने कहा कि जैन आगम (शास्त्र) में कल्पधु्रम के नाम का जो शास्त्र है वह अध्यात्म की महिमा बताता है इस शास्त्र में भौतिक सुख सुविधा की अपेक्षा अध्यात्मक का मार्ग कैसे श्रेष्ठ है यह उल्लेख है। धर्मसभा में बड़ी संख्या में श्रावक-श्राविकाएं उपस्थित थे। धर्मसभा का संचालन दिलीप रांका ने किया।