दो दिनी पूर्णिमा के बावजूद सिंगाजी समाधिस्थल पर नही लगेगा मेला

6:59 pm or October 29, 2020
दो दिनी पूर्णिमा के बावजूद सिंगाजी समाधिस्थल पर नही लगेगा

मयंक शर्मा

खंडवा २९ अक्टूबर ;अभी तक; आश्विन की शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा(इस बार  दो दिनी-30 व 31 को शरद पूर्णिमा जिसे ास पूर्णिमा भी कहते मनाई जायेगी।। निमाड में शरद पूण्र्रिमा का केन्द्र होता है निगुर्णी संत सिंगाजी का समाधिस्थल जहां चार सौ साठ साल से अधिक समय से अख्ंाड ज्योंत जल रही है। दर साल शरद पूर्णिमा पर यहां 10 दिवसीय मेला भरता है जो देश के पश्चिमी क्षेत्र का प्रख्यात मेला होता है। करीब 465 साल मे यह पहली मौका होगा जब कोरोना संक्रमण का खतरा चलते हुये प्रशासन ने मेले की अनुमति नहीं दी है।

पुनासा एसडीएम एस के सोलकी ने बताया कि यहां निशान चढाने की श्रद्धालुओं की श्रद्धा के आगे प्रशासन ने पूर्णिमा के पहले और बाद को मिलाकर 3 दिन की अनुमति दी है। मेला नहीं लगेगा बावजूद भक्तों के पहुंचने का सिलसिला जारी है। समाधि के महंत ने बताया कि सीमित संख्या में आगमन शुरू हो चुका है। वैसै शर पूर्णिमा रात्री में यहा 3 लाख से अधिक लोगो का  हूजूम लगता है लेकिन कोरोना ने पानी फेर दिया है।

एसडीएम ने बताया कि निशान चढाने व मंदिर में सिर्फ दर्शन की अनुमति दी है। प्रसादी, अगरबत्ती आदि पर प्रतिबंध है।  मंदिर में गुरुवार से शुरू हुआ श्रद्धालुओ की आवजाही  शनिवार तक बनी रहेगी।

एसडीएम ने बताया कि कोविड  19 तथा अंचल की मांधाता विस सीट के उपचुनाव की आचार संहिता को देखते हुए प्रशासन ने बाहरी लोगो के प्रवेश पर रोक दिया है जिसके कारण गुजरात महाराष्ट् राजस्थान व देश के प्रदेश के कोने कोने से भक्त नही आ पायेगे।
यहां प्रशासन की ओर से कोई सुविधा भी आगन्तुको के   लिये नहीं दी गई है। सुरक्षा के भी कोई इंतजाम नहीं है। इंदिरा सागर परियाजना के बेक वाटर मे डूब में आने के कारण संत समाधि को परकोटा  का  निर्माण कर सुरक्षित किया गया है और यहा पहुंच के लिये 2 किलोमीटर लंबा पुल है।समाधिस्थल जलाशय पर कुछ छोटे दुकानदारों ने रविवार को ही नारियल प्रसादी व खान-पान की दुकानें लगा ली थी। प्रशासन को सूचना मिलते ही अफसर पहुंचे और दुकानें हटवा दीं। उन्होंने दुकानदारों को चेतावनी भी दी कि फिर से दुकान लगाई तो कानूनी कार्रवाई होगी।
सिंगाजी भक्तों से मास्क लगाने के साथ दो गज की दूरी बनाने का लगातार आग्रह सेवादार कर रहे हैं। फूल, प्रसादी व अगरबत्ती पर भी रोर्क  है।

उपचुनाव के पहले सीएम ने  सिंगाजी को धार्मिक पर्यटन स्थल तो घोषित कर दिया है लेकिन यहां तक पहुंचने के लिए 5 किमी सड़क (बीड़ से सिंगाजी) पूरी तरह उखड़ चुकी है। हजारों की संख्या में अब भी श्रद्धालु समाधि पर मत्था टेकने व  मंहत रतन महाराज ने बताया कि ‘ट्रस्ट की ओर से श्रद्धालुओं के बीच दूरी बनाए रखने और कतार में आने के लिए रेलिंग लगा दी गई है। इससे भीड़ नहीं होगी और लोग कतार में आएंगे।  अगले दो दिनी पूर्णिमा है अत‘ ज्यादा भीड़ रहने की संभावना है। एसडीएम ने कहा कि मेला निरस्त कर दिया है इसलिए सिंगाजी में ज्यादा कर्मचारियों की ड्यूटी नहीं लगाई है। पुलिस जवान तैनात किए हैं। पूरा अमला उपचुनाव की ड्यूटी में व्यस्त है।

0पर्व का महत्व
30 अक्टू को शरद पूर्णिमा है। दो दिनी पूर्णिमा होने से दो भीड रहेगी। शरद पूर्णिका की रात्रि में चन्द्रमा षोडश कलाओं का होता हैं।

पूण्रिमा की रात में गाय के दूध की खीर बनाकर ं, उसमें घी डालकर चन्द्रमा के समक्ष रखे फिर अर्द्धरात्रि के समय भगवान को भोग लगायें। पूर्ण चन्द्रमा के आकाश के मध्य स्थित होने पर उनका पूजन की पंरपरा है। खीर को रातभर खुली चांदनी में रखते है। दूसरे दिन प्रसाद स्वयं खायें व सबको बांटी जाती है।
पंडितों रमेश शर्मा ने बताया कि व्रतधारी रात भर जागरण और भगवान का भजन करते है। रात को अघ्र्य देकर भोजन करते है।

0 कौन थें सिंगाजी
16 वी सदी के संत सिंगाजी का काल खंड संवत (1576 से 1616) माना गया है। वे संत परंपरा के उत्तर भारत की दक्षिण सीमा के अंतिम संत थे। वे महान तत्वों के दृष्टा और अनुभूति के माधुर्यपूर्ण  निमाड़ी भजनों के रचियता थे। वे ऐसे पहले संत थे जिन्होंने खेती के माध्यम से अपने भजन में आध्यात्मिकता का संदेश दिया। उन्होंने 1100 भजनों की निमाड़ी भाषा में रचना की और ये भजन आज भी गांव गांव में गूंजते है। ग्राम ग्राम सिंगाजी के नाम की भजन मंडलिया है। उनके ही भजनों से निमाड़ की संस्कृति और निमाड़ी भाषा परिष्कृत हुई है
निर्गुणी परंपरा के संत सिंगाजी महाराज की समाधि पर  उनकी चरणपादुका और अखंड ज्योत का दर्शन के लिये मत्था टेकने श्रद्धालुजन आतुर रहते है। संत सिंगाजी मूलतः पशु पालक थे। उन्हें मवेशियों से बेहद लगाव था। उनकी समाधि पर श्रद्घालुओं द्वारा घी चढ़ाया जाता है। पशु पालकों के अनुसार, संत सिंगाजी गाय व भैंस के रक्षक माने गए हैं।
बड़वानी जिले के ग्राम खजूरी में संत सिंगाजी महाराज का 24 अप्रैल को वैशाख सुदी नवमी संवत 2075 के दिन  जन्म हुआ था। गुरु मनरंग स्वामी के उपदेश के बाद सिंगाजी को वैराग्य हो गया था। अब उनके समाधिस्थल पर भव्य मेला लगता है और लाखों श्रद्धालु उमड़ते हैं। सिंगाजी के नाम पर खंडवा में थर्मल पॉवर प्लांट भी है। आसपास के गांवों में कथा-प्रवचन होते हैं, जिनमें संत सिंगाजी महाराज की अद्भुत लीलाओं का वर्णन किया जाता है।
सिंगाजी पांच वर्ष के थे तब उनके पिता भीमाजी अपनी पशुधन सम्पदा तथा परिवार लेकर निमाड़ (खंडवा) हरसूद नगर में आकर बस गये।  यही के जंगल में फिफराड़ नदी के किनारे पशुओ की गुवाड़ी स्थापित की। इसी जंगल में सिंगाजी अपने अनुज लिम्बाजी अपने पिता भीमाजी के साथ गाय भैसों को चराते थे और दिन रात अपने पशुओं के साथ रहते थे। सिंगाजी का निर्वाण संवत 1616 में श्रावण सुदी नवमी के दिन हुआ। उनकी समाधि स्थल वाले ग्राम सिंगाजी में प्रतिवर्ष शरद पूर्णिमा पर देश का विशाल मेला भरता है।

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