धन का नशा मदिरा के नशे से अधिक खतरनाक होता है -जैनाचार्य श्री विजयराजजी म.सा.

महावीर अग्रवाल
मन्दसौर १५ अक्टूबर ;अभी तक; धन जितना इच्छाओं को पूर्ण करने का कार्य करता है उससे भी ज्यादा इच्छाओं को बढ़ाने का भी काम करता है। संभव है धन प्राप्त होने पर मन में पैदा हुई दो-चार इच्छाएँ पूरी हो जाएँ मगर वे इच्छाएँ अन्य अनेक इच्छाओं को पैदा करती है, यह निर्विवाद सत्य है, जैसे ब्लोटिंग पेपर पर गिरी हुई स्याही की एक बूंद फैले बिना नहीं रह सकती वैसे ही धन प्राप्त होने के बाद मन इच्छा मुक्त नहीं रह सकता। धन का स्वभाव ही इच्छा पैदा करने का है, कल्पनातीत धन की प्राप्ति के बाद मन भी कल्पनातीत इच्छाओं के सिकंजे में जकड़ जाता है। इच्छाओं की फौज पैदा हुए बिना रह नहीं सकती यह सनातन सत्य है, इसे स्वीकार करना ही पड़ेगा। धनवान मन से संतोषी निर्धन मन कही ज्यादा अच्छा होता है।
                गुरूवार को ये विचार शास्त्री कॉलोनी स्थित नवकार भवन में विराजित जैनाचार्य श्री विजयराजजी म.सा. ने ‘‘क्या धन इच्छापूर्ति में साधक है ?‘‘ विषयक परिचर्चा के समाधान में कहे। आपने कहा- हकीकत में आवश्यकता एक गरीब की भी पूरी होती है मगर इच्छाएँ एक अमीर की पूरी नहीं हो सकती, अधिक धन अधिक इच्छाएं लेकर आता है, अधिक इच्छाएँ अधिक चिंताए बढ़ाती है। इच्छाजीवी कभी निश्चिंत नहीं रह सकता। अल्प इच्छाओं में जीने वाला सुखी स्वस्थ और प्रसन्न रहता है। विपुल सम्पत्ति के स्वामी बन जाने से चिंताएं नष्ट नहीं होती बल्कि चिंताओं का स्वरूप बदल जाता है। धन की अल्पता में असुविधा की चिंता रहती है तो धन की अधिकता में भोग की लालसा जागृत होती है। धन के अभाव में कोई मुझे सम्मान नहीं देता ऐसी बेचैनी होती हो मगर धन की अधिकता होने पर सब मुझे सम्मान देवें- इस चाह में मन बेचैन बना रहता है, धन कुछ-कुछ हो सकता है मगर वह सब कुछ नहीं होता। धन की अधिकता में रात की नींद उड़ जाती है और दिन में भूख नहीं लगती।
                 आचार्य श्री ने कहा-धन की उपस्थिति में आंखों के तारे कब किरकिरी बन जाते है पता नहीं चलता। जिनको व्यक्ति अपना मानता रहा वे ही बेगाने बन जाते है। धन की उपस्थिति में रूतबा बढ़ता है मगर जब रूतबा चला जाता है तब ज्ञान चक्षु खुलते है, तब समझ में आता है-कौन अपना कौन पराया। धन का नशा मदिरा के नशे से ज्यादा खतरनाक होता है, वह नशा तो चार-छः घण्टों में उतर जाता है मगर धन का नशा जल्दी नहीं उतरता, इस नशे में व्यक्ति अपने आपको सर्वेसर्वा मानता है, जब शरीर रोगों से घिर जाता है, इन्दियाँ शिथिल हो जाती है और मौत सामने खड़ी नजर आती है तब व्यक्ति को लगता है-जिस नाशवान धन को अर्जित करने में मैंने पूरी जिंदगी लगा दी वह धन आज मेरी नादानी पर हंस रहा है। कईयों को तन की निर्धनता में भी होश नहीं आ पाता यह भी विडम्बना ही होती है। कोरोना महामारी ने इस सत्य को अच्छी तरह समझा दिया है-धन कितना आवश्यक, कितना अनावश्यक, कोरोना वायरस ने जिसको छू लिया उसे यह सत्य समझ में आ गया, किन्तु क्या कहें-ये वैराग्य भी स्थिर नहीं रह पाता-बिमारी से ठीक हुए नहीं कि फिर वहीं भाग दौड़-विराम लेने का नाम नहीं, कैसी विचित्र मनोदशा है।

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