धर्मदास गणनायकश्री जिनेंद्रमुनिजी के सांसारिक बाल सखा ने झाबुआ पहुंचकर दर्शन किए

6:17 pm or July 22, 2022
अरुण त्रिपाठी
रतलाम २२ जुलाई ;अभी तक;  जिनशासन गौरव आचार्यश्री उमेशमुनिजी म. सा. के सुशिष्य धर्मदास गणनायक प्रवर्तक देवश्री जिनेंद्रमुनिजी म. सा., अणुवत्सश्री संयतमुनिजी, स्वाध्याय प्रेमीश्री जयंतमुनिजी, रतलाम गौरवश्री अमृतमुनिजी, सेवाभावीश्री सुहासमुनिजी एवं नवदीक्षितश्री सुलभमुनिजी म. सा. ठाणा 6 के दर्शनार्थ प्रवर्तकश्रीजी के रतलाम के सांसारिक बाल सखा प्रकाशचंद्र नांदेचा एवं साथी झाबुआ गए। वहां पहुंचकर धर्मदास गणनायक प्रवर्तकश्री जिनेंद्रमुनिजी एवं मुनि वृंद के दर्शन, वंदन कर ज्ञान, दर्शन, चारित्र, तप, संयम साधना, स्वाध्याय, आहार आदि की सुखसाता पूछकर सामायिक आराधना के साथ व्याख्यान, व्याख्यान की मांगलिक के अलावा महत्वपूर्ण मानी जाने वाली ध्यान मांगलिक आदि श्रवण करने का लाभ लिया।
                      इस अवसर पर प्रवर्तक देव एवं मुनिवृंद के सानिध्य में उनकी अद्वितीय प्रेरणा से झाबुआ श्रीसंघ में विभिन्न छोटी बड़ी तपाराधना कर रहे तप आराधकों एवं आसपास श्रीसंघों से दर्शनार्थ पहुंचकर तप के प्रत्याख्यान ग्रहण करने वाले तप आराधकों के तप की बहुत बहुत अनुमोदना कर साता पूछते हुए उनका यह तप लक्ष्य को भेदते हुए कल्याणकारी बने, मंगलकारी बने ऐसी मंगल कामना प्रेषित की गई। इस अवसर पर तप पूर्ण करने वाले आराधकों के तप का बहुमान तप की बोली से करने पर उनकी सभी ने अनुमोदना की। प्रवर्तकश्रीजी ने दोपहर में विशेष ज्ञान चर्चा के दौरान रतलाम के सांसारिक बाल सखा प्रकाशचंद्र नांदेचा (बोरदा वाले) एवं इनके साथ आए प्रवर्तकश्रीजी के सांसारिक भ्राता राजेश गादिया रतलाम, पारस गांधी (तिलगारा वाले) एवं दिलीप दरड़ा बखतगढ़ आदि को अधिक से अधिक अपने अमूल्य समय को धर्म आराधना में लगाकर नियमित आराधना करने की महती प्रेरणा दी। प्रवर्तकश्री ने यह भी फरमाया कि जहां संत सतीजी का वर्षावास हैं, वहां उनके सानिध्य का पूरा लाभ लेते हुए धर्म, ध्यान, ज्ञान आदि आराधना करने के साथ नवीन ज्ञान कंठस्थ करने का लक्ष्य रखना चाहिए। क्योंकि सांसारिक क्षणिक सुख, भोग यहीं रहने वाला हैं और आत्मा के साथ सिर्फ और सिर्फ इस अनमोल मनुष्य जीवन में किया गया तप, त्याग, धर्म, सीखा गया ज्ञान ही आने वाला हैं। जो जीव को मोक्ष लक्ष्य को प्राप्त करने में सहायक बनता हैं। वहीं जहां वर्षावास नहीं हैं वहां श्रावक श्राविकाओं को धर्म स्थानक पर पहुंचकर कम से कम राई व देवसीय प्रतिक्रमण, स्वाध्याय, गुरुदेव का साहित्य वाचन आदि करके अपने ज्ञान में अभिवृद्धि करना चाहिए। साथ ही सीखे गए ज्ञान को दोहराना भी चाहिए। ताकि वह ज्ञान चिरस्थाई रूप में बना रहे। क्योंकि बड़ी ही पुण्यवाणी से मिले इस मनुष्य भव का यह अमूल्य समय हाथ से निकल जाएगा तो इसके पश्चात जीव को केवल पश्चाताप के सिवाय कुछ भी हाथ आने वाला नहीं हैं। प्रवर्तक श्रीजी के समक्ष बाल सखा नांदेचा सा. ने झाबुआ दर्शनार्थ संघ लाने के भाव रखे। प्रवर्तकश्री के बाल सखा व साथियों ने झाबुआ में अनूपकुमार जयंतीलाल घोड़ावत परिवार को आतिथ्य सत्कार का लाभ दिया। प्रवर्तकश्रीजी की सेवा आदि का लाभ लेकर बालसखा व साथी गण झाबुआ से रवाना होकर पेटलावद पहुंचे। जहां प्रवर्तकश्री की आज्ञानुवर्तिनी एवं उनकी सांसारिक बहन साध्वीश्री पुण्यशीलाजी व इनके साथ चतुर्गुणाजी, महकश्रीजी, प्रतिज्ञाजी व आस्थाजी ठाणा 5 चातुर्मास हेतु विराजित हैं। मित्र मंडली ने साध्वी मंडल के दर्शन, वंदन, मांगलिक, ज्ञान चर्चा आदि का लाभ लेकर पेटलावद श्रीसंघ को शाम के आतिथ्य सत्कार का लाभ दिया।