धर्म और अध्यात्म की फल श्रुति नैतिकता है -जैनाचार्य श्री विजयराजजी म.सा.े

महावीर अग्रवाल
मन्दसौर 24 अक्टूबर ;abhi tak;  चिंतन की अनैतिकता ही कलियुग है, कई लोग समय को सतयुग और कलियुग में बांटते हैं, मगर सत्य यह है-चिंतन में जब अनैतिकता आती है तब सतयुग भी कलियुग और चितन में जब नैतिकता रहती है तब कलियुग भी सतयुग का आभास देता है। कलियुग का बहाना बनाकर असत्य का पोषण करना मिथ्याचार है, मिथ्याचार ही कलियुग का प्रमाण पत्र है, जो मिथ्याचारों का पोषण करने में लगे रहते हैं उनसे अभय और सत्य की उम्मीद नहीं की जा सकती। अभय व सत्य नैतिकता की देन है उनकी साधना करके हम कलियुग में भी सत्य का युग ला सकते है सत्य का महत्व जितना कलियुग मंे परिलक्षित होता है उतना सतयुग में नहीं होता, सतयुग तो सत्य से ओतप्रोत होता है, उसमें हर व्यक्ति सत्य का साधक होता है, सत्य को सर्वोपरि मानता है, कलियुग में जो सत्य को सर्वाेपरि माने उसके लिये कलियुग भी सतयुग जैसा होता है। चिंतन सही, शुद्ध, प्रबुद्ध होना चाहिए।
                     ये विचार शास्त्री कॉलोनी स्थित नवकार भवन में विराजित जैनाचार्य श्री विजयराजजी म.सा. ने प्रसारित संदेश में कहे। आपने कहा- अनैतिकता व्यक्ति को दुर्बल बनाती है यह मानसिकता में कमजोरी को प्रवेश करा देती है, मानसिक दृष्टि से कमजोर व्यक्ति चंचल होता है और चंचलता व दुर्बलता ये दोनों सगी बहनें होती है, चंचलता में दुर्बलता का जब समावेश होता है, तब व्यक्ति आर्थिक दृष्टि से कितना भी सम्पन्न हो जीने का सही आनंद नहीं ले सकता, जीवन का सही आनंद लेनेे के लिये मानसिक स्थिति अच्छी होनी चाहिए। अनैतिकता व्यक्ति के मानसिक धरातल को अच्छा रहने ही नहीं देती, वह अन्दर ही अन्दर भयभीत रहता है। भय से भ्रम और भ्रम से ओर अधिक अनैतिक बना देता है। वह यह समझने लगता है-मेरी अनैतिकता पकड़ से बाहर है, मुझे कोई नहीं पकड़ सकता जबकि एक दिन उसकी अनैतिकता पकड़ में आ जाती है, उस समय उसे कोई बचाने वाला नहीं होता। अनैतिकता से धन ही नहीं जाता इज्जत और सामाजिक सम्मान भी चला जाता है।
                         आचार्य श्री ने कहा- नैतिकता व्यवहार शुद्धि का एक अंग है, समाज में जो व्यवहार चलाता है उसमें मन वचन कर्म को निश्छल रखना नैतिकता है। निश्छलता के बिना नैतिकता नहीं आती। जहां मन-वचन कर्म में छल-कपट आता है वही से अनैतिकता का प्रारंभ हो जाता है। छल-कपट की भावना रखने वाला व्यक्ति दूसरों के अधिकार को हड़पने की चेष्टा करता हे, अपने अधिकारों को बढ़ाना उसके लिये चाहे जो कर लेना यह अनैतिक कर्म हैं यह अमानवीयता होती है। अनैतिक व्यक्ति हिंसा, झूठ, चोरी, संग्रह, जमाखोरी, तस्करी और राष्ट्रद्रोह के सारे कार्य करने में कोई संकोच नहीं करता। इसके विपरित नैतिकता में विश्वास रखने वाला व्यक्ति सत्य-अहिंसा का आचरण करता है, नैतिकता पारिवारिक और सामाजिक जीवन का अपरिहार्य अंग है किसी भी युग और किसी भी समाज में उसकी अनिवार्यता को नकारा नहीं जा सकता। नीति के बिना लोक व्यवहार ही असंभव है। धर्म और अध्यात्म की फलश्रुति नैतिकता है यह हृदय की पवित्रता है और आंतरिक उज्जवलता है। कोरोना महामारी के चलते हर इंसान को नैतिकता का मूल्य समझना चाहिए अपने आपको अनैतिक कार्यों से बचाना चाहिए, सत्ता-सम्पत्ति की प्राप्ति के लिए अपनी नैतिकता नहीं छोड़नी चाहिए। नैतिकता, सारे प्रेम, नेम, कुशल क्षेम की आधार शिला है।

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