न.ए. एवं जन्म प्रमाण-पत्र के आधार पर न्यायालय ने दी आरोपी को 20 वर्ष का सश्रम कारावास

महावीर अग्रवाल

मन्दसौर / उज्जैन १० नवंबर ;अभी तक; न्यायालय विशेेष न्यायाधीश (पॉक्सो एक्ट) डॉ0 (श्रीमती) आरती शुक्ला पाण्डेय, षष्ठम अपर सत्र न्यायाधीश महोदय उज्जैन, के न्यायालय द्वारा आरोपी राहुल, उम्र-21 निवासी जिला शाजापुर को धारा 376(3) भादवि एवं 5/6 पॉक्सो अधिनियम में 20 वर्ष का सश्रम कारावास एवं धारा 376(2)(एन) में 10 वर्ष का सश्रम कारावास एवं धारा 363, 366 भा.द.स. 07-07 वर्ष का सश्रम कारावास एवं कुल 3,000/- रूपये के अर्थदण्ड से दण्डित किया गया। 

उप-संचालक (अभियोजन) डॉ0 साकेत व्यास ने घटना अनुसार बताया कि अभियोजन की घटना इस प्रकार है कि पीड़िता की माता ने दिनांक 06.01.2020 को थाने पर उपस्थित होकर प्रथम सूचना रिपोर्ट लेखबद्ध कराई कि मैं मजदूरी करती हूॅ तथा मेरी लडकी की उम्र 16 वर्ष है, जो वर्तमान में पढाई कर रही है। घटना दिनंाक 06.01.2020 को दोपहर लगभग 02ः00 बजे मैंने अपनी लड़की को बाजार से साबुन लाने के लिये तथा उसके पोते को स्कूल में छोडने के लिये भेजा था। पोते को स्कूल से छोडने के बाद मेरी लडकी देर शाम तक घर पर नही आई, तब मेरे द्वारा आसपास मोहल्ले एवं रिश्तेदार में उनकी तलाश की गई लेकिन कोई पता नही चला, मुझे शंका है कि कोई अज्ञात व्यक्ति मेरी लड़की को बहला फुसलाकर कही ले गया है। फरियादिया कि रिपोर्ट पर पुलिस द्वारा अपराध पंजीबद्ध किया था। पीड़िता को दस्तयाब किया गया आरोपी को गिरफ्तार किया गया। पीडिता द्वारा पुलिस को बयान दिये कि आरोपी राहुल उसे किडनैप करके ले गया गया था और उसके साथ दुष्कर्म किया था। पुलिस द्वारा अनुसंधान पूर्ण कर न्यायालय में अभियोग पत्र प्रस्तुत किया गया था। न्यायालय द्वारा अभियोजन के तर्कों से सहमत होकर आरोपी को दण्डित किया गया। 

महत्वपर्ण तथ्य:- न्यायालय में कथन के समय पीड़िता ने अभियोजन का समर्थन नही किया था। अनुसंधान के दौरान डीएनए टेस्ट कराया गया था जो जांच उपरांत डीएनए रिपोर्ट पॉजीटिव प्राप्त हुई थी। अभियोजन अधिकारी श्री सूरज बछेरिया द्वारा पीडिता की उम्र न्यायालय में 16 वर्ष से कम साबित की।  

दण्ड के प्रश्न परः- अभियुक्त द्वारा निवेदन किया गया कि उसकी उम्र को देखते हुये उसके प्रति नरम रूख अपनाया जाये। अभियोजन अधिकारी द्वारा अभियुक्त को कठोर दण्ड से दण्डित किये जाने का निवेदन किया गया। 
न्यायालय ने निर्णय में लेख किया है किः- अदालतों को न केवल आरोपी के अधिकार को ध्यान में रखना चाहिए बल्कि बडे पैमाने पर पीडिता व समाज के हित को भी ध्यान में रखना चाहिए। अपराध की गंभीरता तथा सजा के मध्य उचित अनुपात रखना चाहिए। सजा की अपार्याप्ता से पीडित और समुदाय को बडे पैमाने पर नुकसान पड सकता है। 
प्रकरण में शासन की ओर से पैरवी श्री सूरज बछेरिया, विशेष लोक अभियोजक उज्जैन के द्वारा की गई।