पत्नी को गिफ्ट में ताज महल  लुक में बनवाया 4 बेडरूम का घर

मयंक शर्मा
खंडवा २२ नवंबर ;अभी तक;  मध्यप्रदेश के बुरहानपुर के मेक्रो विजन स्कूल के संचालक आनंद
प्रकाश चैकसे ने अपना घर हु-ब-हू ताजमहल की तरह बनवाया है। 3 साल में
बनकर तैयार हुए 4 बेडरूम वाले इस घर को चैकसे ने अपने पत्नी मंजूषा को
तोहफे में दिया है। इसमें एक बड़ा हॉल, 2 बेडरूम नीचे, 2 बेडरूम ऊपर है।
इसके अलावा किचन, लाइब्रेरी और मेडिटेशन रूम भी है। इस घर को इंडियन
कंस्ट्रक्टिंग अल्ट्राटेक आउट स्टैंडिंग स्ट्रक्चर ऑफ एमपी का अवॉर्ड मिल
चुका है।
मुगल शासक शाहजहां की पत्नी मुमताज महल ने स्थानीय ऐतिहासिक किले में ही
प्रसव पीड़ा के दौरान अंतिम सांस ली और मुमताज महल का पार्थिव शरीर 6
महीने तक यहां आहुखाना में सुरक्षित रखा गया था। शाहजहां मुमताज के लिए
बुरहानपुर से गुजरने वाली ताप्ती नदी के किनारे ताजमहल बनवाना चाहते थे,
लेकिन किन्हीं कारणों से यह ताजमहल बुरहानपुर की जगह आगरा में बनवाया।
शिक्षाविद् आनंद चैकसे के मन में बुरहानपुर में ताजमहल का निर्माण नहीं
होने की कसक थी। इसी कारण उन्होंने अपनी पत्नी को ताजमहल की तरह ही
यादगार गिफ्ट देने की ठानी। ताजमहल जैसे घर के निर्माण में कई अड़चन आई,
लेकिन आनंद के अटूट विश्वास के चलते टीम ने ताजमहल जैसा मकान बनाने में
कामयाबी हासिल की। । खुद आनंद और उनकी पत्नी आगरा के ताजमहल को देखने गए।
लौटने के बाद इंजीनियरों को ताजमहल जैसा ही घर बनाने को कहा। इसके बाद
इंजीनियर प्रवीण चैकसे ने भी आगरा जाकर ताजमहल देखा। इसके बाद इंजीनियरों
की टीम ने कहा कि इस्लामी मायथॉलॉजी के अनुसार ताजमहल मकबरा है। इन सब
तर्कों को दरकिनार करते हुए आनंद चैकसे ने ताजमहल जैसा ही घर बनाने को
कहा।इंजीनियरों ने इंटरनेट के जरिए ताजमहल की 3डी इमेज निकाली। फिर इसे
बनाने का काम शुरू किया गया। तीन साल में यह घर बनकर तैयार हो गया।
इंजीनियर प्रवीण चैकसे ने बताया  ताजमहल जैसा घर का क्षेत्रफल मीनार
सहित 90 बाय 90 का है। बेसिक स्ट्रक्चर 60 बाय 60 का है। गुंबद 29 फीट
ऊंचा रखा गया है।
इस घर को इंडियन कंस्ट्रक्टिंग अल्ट्राटेक आउट स्टैंडिंग स्ट्रक्चर ऑफ
एमपी का अवॉर्ड मिल चुका है।
घर में अधिकतर निर्माण कार्य स्थानीय मिस्रियों से कराया गया है। घर के
अंदर की गई नक्काशी के लिए बंगाल और इंदौर के कलाकार से मदद ली गई है।
घर की फ्लोरिंग राजस्थान के मकराना के कारीगरों से कराई गई है। बाकी काम
आगरा के कारीगरों से कराया गया है। फर्नीचर का काम सूरत और मुंबई के
कारीगरों ने किया।
बुरहानपुर आने वाले पर्यटक शिक्षाविद् आनंद प्रकाश चैकसे के ताजमहल जैसे
घर को देखकर बोलते हैं कि वाह क्या ताज है।
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खंडवा। वाह ताज ! आह ताज !  भले ही ताजमहल आगरा में बना हो लेकिन
हिंदुस्तान की मलिका मुमताज महल की रूह बुरहानपुर के शाही महल में बसती
है। ताजमहल में मुमताज के अंतिम सांस लेने तक की कहानी और मौत से जुड़ी
जानकारी को प्रदर्शित करने की सक्रियता उठती रही है।
देशभर के पर्यटक जान सकें कि मुमताज की यादें बुरहानपुर से जुड़ी हुई
है।बेगम मुमताज महल ने शाही महल में 7 जून 1631 में अंतिम सांसें ली थी।
इसी महल में शाहजहां और मुमताज का प्रेम परवान चढ़ा था। मुमताज की 14वीं
संतान को जन्म देते समय मृत्यु हुई थी। मौत के बाद शव को ताप्ती पार
आहुखाना में अस्थायी कब्र बनाकर 6 महीने तक रखा गया था। इसके बाद उसके शव
को आगरा के ताजमहल ले जाया गया जो दुनिया के सात अजूबा मे से एक होकर
विश्व प्रख्यात है।
बुरहानपुर यानी आज के मध्यप्रदेश का एक जिला। कभी ये मुगलिया सल्तनत को
दक्कन यानी दक्षिण भारत से जोड़ने वाली जगह थी।
अकबर के समय से ही मुगल दक्षिण की ओर बढ़ना चाहते थे और उन्हें कड़ी चुनौती
मिलती थी। विद्रोहियों ने मुगलों की नाक में दम कर रखा था। वे लगातार
ताकत बढ़ा रहे थे।1630 में बादशाह शाहजहां ने दक्कन की तरफ कदम बढ़ाए।
मलिका मुमताजमहल भी उनके इस अभियान में साथ गईं। मुमताज गर्भवती थीं और
ये यात्रा उसकी जिंदगी की आखिरी यात्रा होने वाली थी।
17 जून 1631 दर्द से तड़पती मुमताज ने अपनी 14वीं संतान को जन्म दिया।
शहंशाह को इस खबर से बहुत खुशी हुई। लेकिन मुमताज की हालत बेहद खराब थी।
शायद उसे अनहोनी का अहसास हो गया था।
इसलिए उसने बादशाह से इल्तिजा की कि शहंशाह उनकी मुहब्बत को यादगार बनाने
के लिए इमारत तामीर करे। शाहजहां ने तुरंत मुमताज की इस ख्वाहिश को मंजूर
कर लिया। मुमताज दुनिया से रुखसत हो गईं और अपने पीछे छोड़ गईं एक गमगीन
शहंशाह।
मुमताज को बुरहानपुर के जैनाबाद इलाके में शाही महल के सामने एक बाग में
दफनाया गया। इसे शाहजहां के चाचा दानियाल ने बनवाया था।
मुमताज की मौत से बेहद दुखी शाहजहां ने महल के एक कमरे में खुद को बंद कर
लिया। कहते हैं वो एक साल तक कमरे में बंद रहा और जब बाहर निकला तो बाल
सफेद हो चुके थे। कमर झुक चुकी थी। मुमताज की मौत के गम ने उसे बूढ़ा कर
दिया था। लेकिन इस बीच उसने ताज की तामीर का ख्वाब देख लिया था।मुमताज से
अपने वायदे के मुताबिक आगरा में मकबरे पर काम शुरू हुआ। राजस्थान से
मार्बल लाकर बुरहानपुर में मकबरा बनवाना महंगा था इसलिए आगरा को बेहतर
माना गया।
मुमताज की मौत के करीब 6 महीने बाद दिसंबर 1631 में उसका शव सोने के एक
ताबूत में रखकर आगरा लाया गया।
चूंकि ताजमहल बन ही रहा था, इसलिए मुमताज का शव यमुना किनारे एक इमारत
में रख दिया गया। इसके बाद 12 साल बीत गए और मुमताज वहीं रही।12 साल बाद
मुमताज का शव फिर निकाला गया और ताजमहल के तहखाने में उसे दफन किया गया।
यानी बादशाह की तीसरी बीवी मुमताज महल को तीसरी बार दफनाया गया। इसके बाद
ताजमहल को पूरा होने में आठ साल और लगे। इसके बाद मुहब्बत की जो निशानी
दुनिया के सामने आई, उसने मुमताज महल को अमर कर दिया।
ताजमहल जिसे शाहजहां ने मुहब्बत की निशानी के बतौर दुनिया को दिया। जिसे
टैगोर ने वक्त के गाल पर ठहरा हुआ आंसू कहा। मुमताज जो खूबसूरती की मिसाल
थी।
उल्लेखनीय है कि अमर प्रेम प्रतीक का यह विश्व सात आश्चर्य में गिना जाने
वाला ताजमहल मुगल बादशाह शाहजहां ने अपनी पत्नी मुमताज महल की याद में
ताजमहल का निर्माण कराया था। मूलतः मुगल बादशाह शाहजहां इसे निमाड़ के
पूर्वी अंचल के ऐतिहासिक नगर बुरहानपुर में बनाना चाहते थे लेकिन भौगोलिक
दृष्टि और माटी में दीमक होने के खतरे को लेकर इसका निर्माण आगरा में
यमुना के तट पर कराया गया।
देश में जो बखेड़ा खड़ा हुआ है उसमें अभी यह तय नहीं हो पाया है कि यह
हेरीटाईज है या बड़ा टूरिस्ट स्पाॅट है। पर्यटन के नजरिए से देखे तो
ताजमहल पर गर्व है लेकिन ताजमहल को अब तक उत्तरप्रदेश सरकार ने टूरिज्म
बुक में स्थान नहीं दिया है।
बुरहानपुर के इतिहासकार कमरुद्दीन फलक कहते हैं फतवा-ए-आलमगिरि के अलावा
भी और कई किताबें हैं, जिनमें मुमताज की मौत की तारीख 17 जून दर्ज है। यह
तारीख इसलिए भी पुख्ता है, क्योंकि मुमताज के बेटे औरंगजेब ने खुद अपनी
मां के इंतकाल की तारीख किताब में दर्ज की है।
0 इन्होने कहा।
बुरहानपुर में मुमताज की पुण्यतिथि 7 जून को ही मनाते आ रहे हैं। यहां
उपलब्ध किताबों में मुमताज के इंतकाल की तारीख 7 जून दर्ज है। इसलिए हर
साल केंद्र और राज्य सरकार की मदद से जिला प्रशासन द्वारा कार्यक्रम
आयोजित किया जाता है। -राकेश शेंडे, सहायक संरक्षक, पुरातत्व विभाग,
बुरहानपुर
0आगरा में वाह ताज, तो बुरहानपुर में आह मुमताज
ताज महल। इसकी खूबसूरती देखकर सभी कहते हैं वाह ताज। ठीक इसके विपरीत
जहां बेगम मुमताज ने अंतिम सांस ली (बुरहानपुर) उस स्थान की दुर्दशा
देखकर मुंह से निकल ही आता है आह मुमताज। आहूखाना (जहां मुमताज को छह माह
तक दफनाया गया था) की स्थिति बदतर है। वहीं उत्तर प्रदेश में आगरा के ताज
महल और बुरहानपुर के आहूखाना में वक्त के साथ गहरा नाता भी खत्म हो जाये
इसे लेकर  भी खासा जद्दोजेहाद है।जहां मुमताज को दफनाया गया था उसके
आसपास खेती हो रही है। आहूखाना बाग जहां मुमताज को रखा गया था वहां लोग
पार्टियां मनाते हैं,।
0यहां पत्नि ने बनाया
मिजोरम की राजधानी एजल में डर्टलांग की पहाडियो  पर बना सफेद संगमरमर का
स्मारक एक व्यक्ति के पत्नी प्रेम का खामोश गवाह होने के साथ ही लोगों के
आकर्षण का केंद्र बना हुआ है।
केबी पैराडाइज के नाम से मशहूर यह तिमंजिला स्मारक 57 वर्षीय के.
छानतुआमा ने पत्नी रोशनपुली वर्ते की याद में बनवाया है, जिसकी कार
दुर्घटना में मौत हो गई थी।  यह शाहजहां के ताजमहल की तरह शानदार भले न
हो जो उसने अपनी बेगम मुमताज महल की याद में बनवाया था, लेकिन उसे मिजो
ताजमहलश् के नाम से पुकारा जाता है।
0 एक कशक है, एक चुभन  काश !बुरहानपुर में ताज होता? शहजादा आसिफ
प्रोडक्शन के प्रवक्ता नवीन अग्रवाल ने बताया कि पुण्य  तिथि पर  मुमताज
की फातिहा ख्वानी होगी और रात्रि में परंपरानुसार सांस्कृतिक कार्यक्रम
दर साल होते है।
ताज को दुनिया के सात आश्चर्यों में गिना जाता है और इसे यूनेस्को द्वारा
वश्वि धरोहर स्थल का दर्जा दिया गया है।कवि गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर ने
ताजमहल को काल के कपोल पर रुकी हुई अश्रु की एक बूंद बताया था।
0 महल गुलआरा
महल गुलआरा बुरहानपुर से लगभग 21 किलोमीटर की दूरी पर, अमरावती रोड पर
स्थित ग्राम सिंघखेड़ा से उत्तर की दिशा में है। फ़ारूक़ी बादशाहों ने पहाड़ी
नदी बड़ी उतावली के रास्ते में लगभग 300 फुट लंबी एक सुदृढ दीवार बाँधकर
पहाड़ी जल संग्रह कर सरोवर बनाया और जलप्रपात रूप में परिणित किया। जब
शाहजहाँ अपने पिता जहाँगीर के कार्यकाल में शहर बुरहानपुर आया था, तब ही
उसे गुलआरा नाम की गायिका से प्रेम हो गया था। गुलआरा अत्यंत सुंदर होने
के साथ अच्छी गायिका भी थी। इस विशेषता से शाहजहाँ उस पर मुग्ध हुआ। वह
उसे दिल-ओ-जान से चाहने लगा था। उसने विवाह कर उसे अपनी बेगम बनाया और
उसे गुलआरा की उपाधि प्रदान की थी। शाहजहाँ ने करारा गाँव में उतावली नदी
के किनारे दो सुंदर महलों का निर्माण कराया और इस गांव के नाम को
परिवर्तित कर बेगम के नाम से महल गुलआरा कर दिया।
बुरहानपुर में मुग़ल काल में निर्मित अन्य इमारतों में से इस इमारत का
अपना विशेष स्थान है।
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बुरहाानपुर काला ताज
– बुरहानपुर में शाहनवाज का मकबरा आगरा के ताजमहज की शैली में निर्मित
होने के चलते दिन ब दिन पर्यटकों में काले ताज महल के रूप में लोकप्रिय
होता जा रहा है। इस लोकप्रियता को देखते हुए भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण
विभाग ने मकबरे की मरम्मत और आसपास अच्छा बगीचा विकसित किया है।चुंकि इस
मकबरे की झलक आगरा के ताज महल जैसी दिखाई देती है लिहाजा पर्यटकों में अब
यह मकबरा काले ताज महल के नाम से मशहुर हो गया है और इसी नाम की
प्रसिध्दी के चलते इस काले ताज महल को देखने के लिए देशी विदेशी पर्यटकों
की संख्या बढती जा रही है।

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