पर्यावरण संरक्षण संवर्धन के लिए आज बेबीनार, किए गए कार्यो पर होगी चर्चा

10:25 pm or June 4, 2022

प्रहलाद कछवाहा

मंंडला 04 जून अभी तक. प्राचीन समय से ही आदिवासियो का जुड़ाव जंगले से सतत चलता आया है, या ऐसा कहे की जंगले को संवारने और बढऩे के लिए आदिवासियों का प्रमुख योगदान रहा है तो इसमें कोई अतिसियोक्ति नहीं होगी। जब हम इन ऊँचे घने जंगलो को देखते है तो हमे हमारे आदिवासी होने पर बहुत गर्व की अनुभूति होती है। यहाँ जंगल कई लेखको और कवियों को  प्रेरणा  देती  रही है। जैसे की भवानी प्रसाद जिन्होंने सतपुड़ा के घने जंगल नमक  कविता से जंगल का हमारे जीवन में  महत्व को बहुत ही  सुन्दर तरीके से दर्शया है। इन सब का श्रेया हमो आदिवासी समाज को ही जाता है।

आज पर्यावरण दिवस का दिन आदिवासियो की सरल, सुमधुर जीवन शैली और  विचारो का जश्न मानाने के लिए है और धन्यवाद् करने के लिए है, जिनकी वजह से हम शुद्ध हवा, निर्मल पानी और स्वच्छ वातावरण का आनंद ले पा रहे है। हम आदिवासियों की जीवन शैले में हर एक त्यौहार में जंगले का जुड़ाव साफ झलकता है चाहे वह हरियाली अमावस्या, तीज त्यौहार हो या कोई अन्य त्यौहार हो।

बेबीनार में होगी पर्यावरण पर चर्चा:

हम अपनी संस्कृति में पर्यावरण को शुद्ध रखने और जंगल को बचाने के लिए शुरू से ही बहुत ध्यान रख रहे है और इनके रीति रिवाजों से जोड़ा गया है। यह संस्कृति आज हमारी धरोहर को बचाए रखने में मदद कर रही है।  इसी को जीवित रखने के लिए आज पर्यावरण दिवस के अवसर एक बेबीनार कार्यशाला का आयोजन किया गया है। जिसकी थीम है एक ही धरती, आदिवासी जीवन और प्राकृतिक संपदा, एक अटूट बंधन है। बेबीनार का आयोजन आज 05 जून को दोपहर 03 से शाम 05 बजे तक आयोजित किया जाएगा। जिसमें उपसंचालक कृषि विभाग मप्र रवीन्द्र मोदी, निर्देशक इको सोल एनवार्यो, संयुक्त संचालक कान्हा टाइगर रिर्जव नरेश सिंह यादव, एफईएस से मॉडरेटर सत्यसोभन दास, ईशान अग्रवाल,  गौंड चित्र कलाकार पद्यश्री श्रीमति दुर्गा बाई वयाम, जैविक किसान पद्यश्री बाबू लाल दहिया, सामुदायिक आगेवान श्रीमति लमिया बाई समेत पूरे मप्र से युवा, अधिकारी, कर्मचारी इस बेबीनार में शामिल हो सकते है।