पुण्य और धर्म ही व्यक्ति को ताकतवर बनाते है -जैनाचार्य श्री विजयराजजी म.सा.

महावीर अग्रवाल
मन्दसौर ५ अक्टूबर ;अभी तक; इस संसार में वही सफल, सम्पन्न, समृद्ध बनता है जो स्वास्थ्य, पुण्य, प्रतिभा, धर्म और सद्भावनाओं से ताकतवर होता है, इनमें एक से भी कमजोर व्यक्ति ताकतवर नहीं कहलाता।  मात्र शरीर बल की ताकत तो मजदूरांें के पास भी बहुत होती है पर अन्य ताकतें नहीं होती। जिनके कारण वह सम्पूर्ण ताकतवर नहीं होते। सम्पूर्ण ताकत ही व्यक्तित्व की प्रतिष्ठा व पहचान होती है। इसे उपायों के द्वारा प्राप्त की जा सकती है। हर युग में ताकतवरों का बोलबाला रहा है। कमजोर व्यक्ति मन और इन्द्रियों का दास होता है। यह दासता उसे ओर कमजोर कर देती है। कमजोर होना अपने आप से दुःखी होना है। अस्वस्थता, पुण्यहीनता, प्रतिभाशून्यता और धर्मविमुखकता व्यक्ति को हर तरह से कमजोर करती रहती है। कमजोरी की दीमक जीवन की सरसता व सफलता को चटकर जाती है।
                    ये विचार शास्त्री कॉलोनी स्थित नवकार भवन में विराजित जैनाचार्य श्री विजयराजजी म.सा. ने प्रसारित एक संदेश में कहे। आपने कहा- कमजोर तबका हर युग में अभिशप्त रहा है और ताकतवर पूजनीय बना है। ताकतवर के पास प्रखर प्रतिभा होती है जिसके बल पर वह तत्काल निर्णय लेने की क्षमता रखता है, निर्णय जिसका सही होता है, वह किसी भी क्षेत्र में कमजोर नहीं रह सकता। निर्णायक क्षमता शर्ट के पहले बटन की तरह होती है, शर्ट का पहला बटन सही लगता है तो नीचे के सारे बटन सही लगते है और पहला बटन गलत लग गया तो नीचे के सारे बटन गलत लगते जायेंगे। ऐसे ही निर्णायक क्षमता व्यक्ति को ताकतवर बनाती है, ढुलमुल निर्णय व्यक्ति  का कमजोर पक्ष उजागर करते है। निर्णय लेने में देर हो मगर निर्णय लेने के बाद दृढ़ रहना चाहिए। बार-बार निर्णय बदलने वाला सही राह पर होते हुए भी मंजिल प्राप्त नहीं कर सकता। अनिर्णय की स्थिति में व्यक्ति खेद, पश्चाताप, उपहास का पात्र बनता है वह किसी भी कार्य में सफल नहीं हो सकता। एक सैनिक युद्ध क्षेत्र में है शत्रु ने यदि युद्ध का पैंतरा बदल लिया तो बुद्धिमान सैनिक अपनी त्वरित बुद्धि से तत्काल निर्णय लेकर पैंतरा बदल लेता है, न बदले तो वह हार जाता है। सैनिक कितना भी ताकतवर हो उसे समर भूमि में तत्काल निर्णय लेना आना चाहिए तभी उसकी ताकत पहचान बनती है।
                     आचार्य श्री ने कहा-जो ताकतवर है मगर कार्य कर्मठ नहीं है तो उसकी ताकत किसी भी तरह से गौरवान्वित नहीं होती। आलसी लोगों को ताकतवर होना उनके जीवन पर लानत देता है, कर्मठता से व्यक्ति तन-मन-धन सभी से ताकतवर बनता है। कर्मठ व्यक्ति को ही परिवार, समाज से सब तरह का सहयोग मिलता है। जब वह अपनी कर्मठता से सबका सहयोगी बनता है तो उसके सहयोग से भी सब खड़े रहते है। ताकत की तभी पहचान होती है। विपत्ती के क्षणों में जो सहयोगी बनते है वे ही वफादार होते है। ताकतवर व्यक्ति केवल देह पिण्ड से ही बलवान नहीं होते उनकी पुण्य, पुरूषार्थ और प्रतिभा जबर्दस्त होती है जिसके कारण हर क्षेत्र में उन्हें सफलता व सम्पन्नता के दर्शन होते हैं कोरोना महामारी में हर व्यक्ति अपने पुण्य को बढ़ाये और पाप को घटाये। पाप कमजोर करते हैं, पुण्य ताकतवर बनाते है। दूसरों की सेवा, सहयोग और सहानुभूति में लगे, इससे पुण्य बढ़ता है, पुण्य की उपस्थिति में हर समस्या बौनी हो जाती है। पुण्य व धर्म ही सच्ची ताकत है ये ताकतवर बनाते है।

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