पुण्य खुश करता है जबकि धर्म संतुष्टि देता है -जैनाचार्य श्री विजयराजजी म.सा.

महावीर अग्रवाल
मंदसौर २५ सितम्बर ;अभी तक; पुण्य खुश करता है और खुशियाँ देता है मगर पुण्य प्रदत्त खुशियांँ बहुत लम्बे समय तक नहीं टिकती। पुण्य कब क्षीण हो जाए कुछ कह नहीं सकते। पुण्य अक्षीण बना रहे इसके लिये प्रयत्न करने आवश्यक है। पुण्य क्षीण होते है अपने ही कार्यों व क्रियाओं से और उसे अक्षीण बनाने के लिये भी हमें अपने पुरूषार्थ को सही दिशा में लगाना चाहिए। विपरित दिशा में लगा पुरूषार्थ पुण्य को क्षीण करता है। पुण्य की क्षीणता में प्राप्त खुशियां गम में बदलने लग जाती है। वैसे भी सांसारिक जीवन में कभी पुण्य, कभी पाप का पलड़ा भारी-हल्का होता रहता है। सांसारिक जीवन कभी एक जैसा नहीं रहता, इसमें उतार-चढ़ाव आते रहते है, हर जीव को समय व परिस्थितियों क थपेड़े खाने ही पड़ते है, कोई विरला जीवन होगा जो इनसे बचा हो। हर जीव को हल्के-भारी थपेड़े खाते हुए जीवन बसर करना होता है। पुण्य खुश करता है जबकि धर्म हमंे संतुष्ट करता है, संतुष्टि बड़ी होती है, खुशी तो अस्थाई होती है, संतुष्टि स्थायी रहती है। संतुष्टि धर्म से ही प्राप्त होती है। संतुष्ट व्यक्ति खुश रहता है मगर खुश व्यक्ति संतुष्ट रहे यह जरूरी नहीं है। धर्म के साथ पुण्य है तो खुशी व संतुष्टि दोनों ही उपस्थिति रहेगी, हर संसारी जीव को धर्म और पुण्य की साथ-साथ आराधना करनी चाहिए।
                      ये विचार नवकार भवन में विराजित जैनाचार्य श्री विजयराजजी म.सा. ने प्रसारित संदेश में कहे। आपने कहा- कई मानते हैं सामग्रियां खुशियां लेकर आती हैं, ये सामग्रियों का स्वभाव नहीं अपना स्वभाव है, सामग्रियां निर्जीव-निष्प्राण होती है, उनमें खुशी-गम देने का स्वभाव नहीं होता। खुश होना, गमगीन होना जीव का स्वभाव-विभाव होता है। पर पदार्थों से मिलने वाली खुशी उनके वियोग में गम देकर चली जाती हैं, इसलिये इस चक्कर में न पड़कर हर इंसान को कर्तव्यनिष्ठ होकर धर्म की आराधना करनी चाहिए। जीवन में धर्म है तो सबकुछ है। यह संतुष्टि ही दिल को शांत रखती है और दिमाग को स्वस्थ। दिमाग की अस्वस्थता दिल को बेचैन करती है, यह खेल निरंतर चलता रहता है। संसारी लोग इन खेल में कभी खुश और कभी नाखुश होते रहते है। सजग व जागरूक आत्माएं धर्म में रमण करती हैं, धर्म से प्राप्त होने वाली संतुष्टि उन क्षणिक खुशियों से कई गुना अधिक होती हैं। संतुष्ट व्यक्ति ही प्राप्त को पर्याप्त मानता है उसे अप्राप्ति की बेचेनी ंनहीं सताती, वह हर हाल में खुश रहता है।
                     आचार्य श्री ने कहा- धर्म में शाश्वत सुखों की प्राप्ति होती है, धर्म ही अहिंसा, संयम और तप रूप होता है। जिसका मन सदैव धर्म में रमा रहता है उसे मानव ही नहीं देवता भी नमस्कार करते है। यह आगम वाणी है, धर्म धु्रव है, नित्य और शाश्वत है, वह कभी नष्ट नहीं होता, उसकी त्रैकालिक सत्ता बनी रहती है। धर्म आस्था व श्रद्धा का विषय है आस्था व श्रद्धा नहीं है तो कई लोगों को धर्म भी धोखा व पाखण्ड लगता है। आस्था है तो धर्म मोक्ष का रास्ता है। धर्म से रखो  वास्ता तो मिलेगा मुक्ति का रास्ता। कोविड महामारी के चलते हर मानव को क्षणिक खुशी नहीं स्थायी संतुष्टि के लिये धर्म को अपनाना चाहिए। धर्म पहले सन्मति जगाता है बाद में सद्गति दिलाता है। धर्म कभी निष्फल या निरर्थक नहीं जाता वह अपना फल देता ही है।

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