पैसों का लालच ही व्यक्ति को अपराधी बनाता है -जैनाचार्य श्री विजयराजजी म.सा.

महावीर अग्रवाल
मन्दसौर १७ अक्टूबर ;अभी तक; मानव की मनोवृत्ति से आपराधिक प्रवृत्तियों का जन्म होता है, जो आचार-विचार व्यवहार को कलुषित बना देती है। विशुद्ध मनोदशा तो व्यक्ति को जीवन की ऊँचाईयों पर ले जाकर उसे इन्सान और भगवान बना देती है, जबकि अपराध मलीन अंतरंगता से जन्म लेकर इन्सान को हैवान बना देते हैं। हर युग में अपराध व अपराधियों का बोलबाला रहता है, ये व्यक्ति को नैतिक ऊँचाईयों से गिराकर अनैतिक ही नहीं पाशविक और पैशाचिक स्तर पर ला देते है। अपराधी न केवल अपने जीवन में दुःखी होता है उसका परिवार भी संकटों से घिर जाता है। उसकी सामाजिक प्रतिष्ठा भी नहीं रहती उसे घृणा, नफरत की दृष्टि से देखा जाता है, सभ्य समाज में उसका कोई भरोसा नहीं करता। अपराधों की दुनिया में प्रवेश करना आसान है, मगर निकलना कठिन हो जाता है। बिना साहस, समझ और संकल्पों के जगे व्यक्ति आपराधिक जीवन से मुक्त नहीं हो सकता।
                 ये विचार शास्त्री कॉलोनी स्थित नवकार भवन में विराजित जैनाचार्य श्री विजयराजजी म.सा. ने ‘‘अपराध क्यों होते है ?‘‘ विषय पर प्रसारित अपने मंगल संदेश में कहे। आपने कहा- चोरी डकैती, बलात्कार जैसे अपराध वही व्यक्ति करता है जो परिश्रम से जी चुराता है। बिना परिश्रम  से अधिक पैसा प्राप्त करने की हविस में व्यक्ति अपराधों के अरण्य में उतर जाता है, फिर अज्ञानता, अकर्मण्यता की भूल भूलैया में खो जाता है। पहले अपराध में वह रोता है, दूसरी बार में वह हंसता है, तीसरी बार के बाद वह अपराध उसकी आदत बन जाता है, आदतन अपराधी को अपने कृत्यों पर कभी पश्चाताप नहीं होता। कर्मशील मानव को अपनी भुजाओं एवं अपने पौरूष पर विश्वास होता है, इसलिये वह कभी भी अपराधों के दंगल व जंगल में नहीं फंसता, वह पैसांे का लालच नहीं रखता। पैसों का लालच ही व्यक्ति को अपराधी बनाता है।
               आचार्य श्री ने कहा- अपराधों की राह बहुत गूढ़ होती है इसमें फंसने के बाद व्यक्ति का निकलना बहुत मुश्किल होता है, उसे कई बार सही राह दिखाने वाले भी मिलते है, मगर उसकी बुद्धि पर ऐसा पर्दा आ जाता है, जिससे उसे सद्राह दिखती ही नहीं, अपराध का रास्ता गिरने का रास्ता है। शारीरिक दुःख, पारिवारिक कलह, मानसिक क्लेश और सामाजिक अपयश अपराधी के सामने खड़े ही रहते है। संभल पाना और संभलकर स्थिर रहना ये दोनों कार्य आदतन अपराधी के लिये चुनौती भरे होते है। जो साहसी होते है वे संभल जाते है और अपनी दिशा बदल लेते है।
                 आचार्य श्री ने कहा- इस क्षेत्र में जाने पर धर्म का तो नाश होता ही है मगर धन भी कलंकित हो जाता है। धर्म के क्षेत्र मंे लगा हुआ धत धर्म बनकर फलदायी बनता है और अपराध के क्षेत्र में लगा धन सब पुण्यों को गला देता है, जैसे आग सबको जलाकर राख कर देती है इसी तरह अपराधों से भाग्य, पुण्य, सुख, शांति, आनंद, अमन चैन सब जलकर राख हो जाते हैं धन और धर्म दोनों ही विनष्ट हो जाते है। अच्छे इंसान भूल करके भी अपराधों की गली में पैर नहीं रखते, भूल से कभी चले जाते हैं तो समझ आते ही वापिस मुड़ जाते है। जो सुख संतोष में है वो पैसों के लोभ में नहीं है। लोभ सर्व विनाशकारी है इस सत्य को समझें।

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