प्रकृति जनित कोसा वस्त्र पवित्रता के साथ राजसी पहनावा देशी वस्त्र कला अब नये रूप में

9:13 pm or November 7, 2020
प्रकृति जनित कोसा वस्त्र पवित्रता के साथ राजसी पहनावा देशी वस्त्र कला अब नये रूप में

मण्डला से सलिल राय की रिपोर्ट

मंडला ७ नवंबर ;अभी तक; मध्यप्रदेश के मण्डला जिले में पौराणिक काल से अपनी पहचान बनाये कोसा कपड़ा उत्पादन और राजसी वस्त्र पहनावे की पहचान लिए कोसा वस्त्र की अपनी एक अलग कहानी आदिकाल के ज्ञात ऐतिहासिक वर्णन में लिपिबद्ध हैं राजे महाराजे कोसा कपड़ो के वस्त्रों को धारण करते रहे वही कोसा कपड़े के वस्त्र पवित्रता की पहचान लिए है पूजा पाठ के अवसरों में कोसा वस्त्र पहनने की परम्परा हमारी देश में रही। वही कोसा वस्त्र तैयार करने में यह प्रकृति जनित वस्त्र हैं ।

मण्डला जिले में जिला रेशम अधिकारी चित्रेन्द्र द्विवेदी से मण्डला जिले कोसा उत्पादन के बारे में विस्तृत बातचीत में रेशम की कहानी सामने आई वह हम आगे बता रहे वही मण्डला जिले में वनांचलों में वनवासी परिवार शहतूत के पौधों से मलबरी सिल्क का उत्पादन होता वही अर्जुन और साजा पेड़ो से टसर एवं कोसा धागों को उत्पादन करने में ग्रामीण आजीविका से वनवासियों को रोजगार सृजन हो रहा हैं।

मण्डला जिले में मनरेगा रेशम केंद्रों के जरिये जहां मण्डला जैसे पिछडे जिले में श्रमिकों को रोजगार की आस हैं वही जिले में श्रमिकों के पलायन में इन केंद्रों को नियमितीकरण संचालन की गम्भीर पहल होनी चाहिए मण्डला के मनेरी और उदयपुर उद्योग इकाइयों में स्थानीय रहवासियों को क्या रोजगार मिलता यह सबके सामने हैं ऐसे में कोसा वस्त्र उत्पादन की दिशा में जिम्मेदार जनप्रतिनिधियों के प्रशासन लगातार उदासीनता से नाता जोड़े हुये वही जिले भर में रेशमी कोसा उत्पाद में लगे लोगो को इस प्रकृति जनित कोसा धागा से रोजगार सृजन कला सम्पदा को और गतिशीलता लाने की दिशा में आगे आकर इस उद्योग को सम्बल प्रदान की आवश्यकता का जरूर अवलोकन कर इस व्यवसाय को अच्छे बाजार उपलब्ध कराने के लिए कारगर प्रयास होने चाहिए।

मण्डला में जिला रेशम कार्यालय परिसर में धागा उतपादन की इकाईयों में कार्यरत महिलाओं के साथ जिले में हजार हाथो धागा निकालने की कला तो है वही इसी परिसर में प्रकृति प्रदत्त वस्त्रों के विक्रय के काउंटर में साड़ियां सलवार शूट जैकिट कुर्ते शॉल स्टोल आदि अब कोसा के परम्परागत क्रीम कलर के साथ रंगबिरंगी आकृति के वस्त्र उपलब्ध हैं।

रेशम उत्पादन की कहानी से परचित होने को भी जानिए प्रकृति की अनमोल सम्पदा से कैसे जन्म होता हैं इन वस्त्रों का इस फीचर को तैयार करते समय रेशम कार्यालय के चौधरी जी और पटले जी के साथ यहाँ कार्यरत बुनकरों से जो जाना वह यह कहानी सामने आती हैं।

रेशम शब्‍द से ही मन में रेशमीअहसास पैदा होता है, जो सुन्‍दर, मुलायम, चिकना तथा सुनहरा होता है। रेशम का धागा बहुत मुलायम तथा मजबूत होता है जो रेशम कृषि द्वारा अपने जीवन के लार्वा प्‍यूपा व तितली अवस्‍था में परिवर्तन हेतु अपना कवच / खोल होता है। रेशम क़मि पौधों की पत्तियां खाकर 25 से 30 दिन में पेट की सेल्‍फ ग्‍लेण्‍ड में पत्तियों का रस इकटठा करता है जो लार्वा अवस्‍था  पूरी होने पर लार के रूप में बाहर निकलता है यह हवा के सम्‍पर्क में आने से धागा में बदल जाता है जिससे कृमि के चारों ओर आवरण बन जाता है । इसी खोल के अन्‍दर उसकी प्‍यूपा व तितली बनने की प्रक्रिया पूर्ण होती है। तितली बनते ही तितली खोल को छेद कर बाहर आ जाती है तथा बचे हुए खोल का उपयोग रेशम धागा तैयार करने में किया जाता है।

तितलियां बाहर आने पर अण्‍डे देती है जिससे 9 से 10 दिन में छोटे क़मि बाहर आकर पुन: पत्‍ती खाकर अपना जीवन चक्र लगातार चलाते रहते है।

रेशम धागों  का उपयोग शुद्ध रेशमी वस्‍त्र बनाने में या अन्‍य धागों के साथ मिलाकर उनकी गुणवत्‍ता बढाने में किया जाता है। उत्‍पादित वस्‍त्रों का अधिकतर निर्यात होता है जिससे विदेशी मुद्रा प्राप्‍त होती है तथा रेशम उत्‍पादन में स्‍थानीय लोगों को रोजगार प्राप्‍त होता है।

रेशम, पौधों व कृमियों से तैयार होता है जो पूर्णतया प्राकतिक होता है उसे रसायनों से तैयार नहीं किया जा सकता है। सिल्‍क का उत्‍पादन विश्‍व के लगभग सभी देशों में होता है जिनमें चाईना , थाईलैण्‍ड , जापान , कोरिया, भारत इत्यादि प्रमुख देश है। परन्‍तु इन सब देशों की अपेक्षा भारतीय सिल्‍क की गुणवत्‍ता अच्‍छी होती है।

रेशम का उत्‍पादन ग्रामीण क्षेत्रों में होता है परन्‍तु उपयोग उच्‍च वर्ग द्वारा किया जाता है, रेशम में उत्‍पादित वस्‍त्रों की गुणवत्‍ता अच्‍छी होने के कारण इन्‍हें वस्‍त्रों की रानी के रूप में जाना जाता है।

    रेशम धागा सामान्‍य तौर पर क्रीम कलर का होता है। मलबरी रेशम धागों की मौटाई इतनी कम होती है कि साधारण आंखों में नहीं दिखता परन्‍तु हाथ से छूने पर अहसास होता है इसी का उपयोग पुराने समय में राजा-महाराजाओं द्वारा कम आकार की साड़ी बनाने में किया जाता था, जो माचिस की डिब्‍बी में आ जाती थी तथा पूरी साड़ी का आकार इतना होता था कि अंगूठी के आर-पार निकल जाती है, दक्षिण भारत में यह कला आज भी जीवित है।

    रेशम का उपयोग प्राचीन समय से ही वस्त्र बनाने में किया जाता रहा है, जिसका उल्‍लेख रामायण व महाभारत में है। रेशम वस्‍त्रों का उपयोग पवित्र माना जाता है जिससे इसका उपयोग धार्मिक कार्यों व पूजा पाठ में अधिक किया जाता है।

    रेशम की उत्‍पत्त्‍िा के बारें में कहा जाता है कि  इसकी उत्‍पत्त्‍िा चीन से हुई है। चीन की राजकुमारी अपने बगीचे में एक वृक्ष के नीचे बैठी हुई थी, टेबल पर चाय की प्‍याली रखी हुई थी, राजकुमारी के बगीचे में टहलने के दौरान वृक्ष से कोसाफल नीचे गिरा व प्‍याली में आ पड़ा। जिसे सहायकों द्वारा उठाने पर लम्‍बा धागा सा खिंचता चला गया जिसे बाद में धागे के कमण्‍डलों में रेशम बीच को छिपाकर भारत लाया गया जहां से रेशम की पैदावार शुरू हुई। जिस मार्ग का उपयोग किया जाता था उसे सिल्‍क रूट के नाम से जाना जाता है जो विश्‍व के मानचित्र में आज भी अंकित है।

    रेशम उत्‍पादन में भारत दूसरे स्‍थान पर है तथा भारत के कर्नाटक, आंध्रप्रदेश, महाराष्‍ट्र, झारखण्‍ड, छत्‍तीसगढ, मध्‍यप्रदेश, बिहार, उत्‍तरप्रदेश अग्रणी श्रेणी में है। देश में रेशम उत्‍पादों को बढ़ावा देने हेतु भारत सरकार द्वारा केन्‍द्रीय रेशम बोर्ड का गठन किया गया है तथा प्रदेश सरकार अपने अधीनस्‍थ रेशम संचालनालय बनाकर रेशम की योजना का संचालन किया जाता है।

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