प्रताप जयंती पर विशेष- महाराणा का भूमिगत होना उनकी युद्ध नीति का हिस्सा था

महावीर अग्रवाल
मंदसौर १२ जून ;अभी तक;  राजस्थान का इतिहास  उठाकर देखें तो यह पढ़ने को मिलता है कि राजपूतों में वीरता की कोई कमी नहीं थी किंतु आपस के अहंकार और स्वार्थ के कारण राजपूत कभी एक नहीं रहे यदि राजपूत एक होते तो भारत में मुगलों का प्रवेश ही नहीं होता।
                 मेवाड़ के महाराणा प्रताप ने अपने जीवन काल में कभी भी मुगलों की दासता स्वीकार नहीं की वह अकेले ही ऐसे राजपूत थे जिन्होंने अकबर से अनेक युद्ध लड़े और वह भी भील जाति के सैनिकों को साथ में लेकर किंतु प्रताप की सेना की संख्या कम होने के बाद भी  ना तो अकबर उन्हें जीत पाया और ना ही महाराणा अकबर को जीत पाए।
                 हल्दीघाटी का युद्ध 1576 में हुआ इस घमासान युद्ध में अकबर की सेना पराजित नहीं हुई किंतु थक चुकी थी जबकि अनेक राजपूत राजा अकबर की तरफ से महाराणा के खिलाफ लड़ रहे थे  युद्ध में महाराणा भी गंभीर रूप से घायल हो चुके थे उनका प्यारा घोड़ा चेतक भी चल बसा था।
इस युद्ध में महाराणा प्रताप बहुत ज्यादा घायल हो गए तथा उनके अनेक सैनिक मारे गए इस विकट परिस्थिति को देखकर महाराणा ने भूमिगत होने का निर्णय लिया और वह रहस्यमय तरीके से गायब हो गए जंगल में भीलो ने गुप्त रूप से उनका उपचार और सेवा  की उन्हें चिकित्सा की सारी सुविधाएं उपलब्ध कराई और शत्रुओं की गतिविधियों पर नजर भी रखी वे दिन रात धनुष बाण लेकर हर समय महाराणा की सुरक्षा में  तैनात रहते थे।
                  इन दिनों में महाराणा कोई चुपचाप नहीं बैठे थे उनकी आंखों के सामने हल्दीघाटी के युद्ध का दृश्य नाच रहा था उनके बारे में उनके विरोधी और कायर राजाओं ने अकबर को खुश करने के लिए यह झूठी खबर फैलाई की महाराणा प्रताप घास की रोटी खाकर अपनी जिंदगी व्यतीत कर रहे हैं किंतु महाराणा उस समय एक नई युद्ध नीति को अंजाम दे रहे थे और उन्होंने मेवाड़ के विभिन्न भील सरदारों से संपर्क बनाया और एक नई सेना तैयार करने की मुहिम मैं लगे रहे इस बीच वे अपने प्रमुख सरदारों और सेनापतियों से जुड़े हुए थे तथा भामाशाह उनकी भेंट जंगल में ही हुई थी जहां प्रताप से उन्हें अपनी युद्ध नीति के बारे में समझाया था और नई सेना के लिए धन की बात की थी और भामाशाह ने उनको यह वचन दिया था कि मैं अपना सब कुछ मेवाड़ के लिए समर्पित करूंगा और इसके अतिरिक्त मेवाड़ के अन्य व्यापारियों से भी सेना के लिए धन संग्रह करूंगा।
                    इस प्रकार लगातार बहुत समय तक महाराणा  जंगलों में रहे और उन्होंने नई सेना का गठन  किया इधर महाराणा को गिरफ्तार करने के लिए अकबर के सैनिक यहां हुआ उनको ढूंढ रहे थे किंतु  जब जब अकबर की सेना ने उनके साथ युद्ध किया तब तब उनकी  सेना हताश होकर वापस चली गई अकबर  कभी भी महाराणा प्रताप पर विजय प्राप्त नहीं कर सका।
                  अंत में अकबर जब अपने मकसद में असफल रहा तो उसका दिमाग भन्ना  गया और उसने अपने सभासदों के बीच में यह निर्णय लिया कि  अब हम मेवाड़ पर आक्रमण नहीं करेंगे और अकबर ने  महाराणा प्रताप को यह संदेश दिया कि मैं संपूर्ण राजस्थान पर अधिपत्य कर सकता हूं किंतु महाराणा को पराजित करना मेरे बस का नहीं है इसलिए महाराणा के जीवन काल में मैं कभी भी मेवाड़ पर आक्रमण नहीं करूंगा।
                  राजपूत जाति के लोगों के लिए यह अत्यंत ही प्रेरणादाई है कि जिस समय अनेक राजपूत राजा मुगलों के बिछाए जाल में फंस कर सुरा और सुंदरी में व्यस्त थे उसी समय महाराणा प्रताप जैसे शूरवीर अपने मेवाड़ की आजादी के लिए लड़ रहे थे और आज इसीलिए महाराणा प्रताप को राजपूत समाज सहित संपूर्ण भारतवर्ष अपना आदर्श मानता है तथा स्वत: ही उनकी प्रतिमा के सामने माथा झुक जाता है।
       आज उनकी जयंती के उपलक्ष में हम सभी उनको प्रणाम करते हैं।
– रमेशचन्द्र चन्द्रे