प्रदेश में सबसे अधिक दाम पर बिका बैतूल का महुआ

मयंक भार्गव

बैतूल २९ अगस्त ;अभी तक;  सतपुड़ा की वादियों में बसे बैतूल जिले का सागौन देशभर में प्रसिद्ध होने के बाद अब जिले के जंगलों में होने वाले महुआ ने भी जिले को अलग पहचान दी है। वन विभाग द्वारा इस वर्ष समर्थन मूल्य पर की गई महुआ की पिछले दिनों नीलामी की जिसमें बैतूल जिले के खेड़ी परिक्षेत्र और शाहपुर परिक्षेत्र में संग्रहित महुआ प्रदेश भर में सर्वाधिक महंगे दाम 56 रूपए 25 पैसे प्रतिकिलो के हिसाब से बिका। जिले के ही ग्राम पाढर के महुआ व्यापारी मे. गेलेन्द्र कुमार लिखीराम राठौर ने खेड़ी और शाहपुर में संग्रहित महुआ नीलामी में 5625 रूपए प्रति क्विंटल के हिसाब से खरीदा जो प्रदेश में सर्वाधिक दाम है। बाकी सभी स्थानों पर महुआ की नीलामी इससे कम दाम पर ही की गई।

ज्ञातव्य हो कि वन विभाग ने इस साल समर्थन मूल्य 30 रूपए किलो पर महुआ संग्राहकों से महुआ की खरीदी की थी। वन विभाग ने जिले में महुआ के बेस्ट क्वालिटी के लिए कुछ स्थानों पर नेट भी वितरित किए थे ताकि महुआ जमीन पर गिरे बिना ही नेट पर जमा हो जाए। इसके चलते जिले में महुआ की क्वालिटी ठीक रही। इस साल महुआ के सीजन में लॉकडाउन रहने से व्यापारियों द्वारा औने-पौने दामों में महुआ की खरीदी की जा रही थी तब मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के निर्देश पर वन विभाग ने समर्थन मूल्य 3000 रूपए प्रति क्विंटल के हिसाब से महुआ की खरीदी कर संग्रहण किया था। वन विभाग द्वारा पिछले दिनों प्रदेश भर के महुआ उत्पादक जिलों में महुआ की नीलामी की गई। प्रदेश भर मेें हुई नीलामी में क्वालिटी के हिसाब से वन परिक्षेत्र खेड़ी और शाहपुर में संग्रहित महुआ 5625 रूपए प्रति क्विंटल के हिसाब से बिका जो प्रदेश भर में सबसे अधिक दाम है। इसके अतिरिक्त जिले में संग्रहित अधिकतर महुआ 5 हजार से 5600 रूपए प्रति क्विंटल के हिसाब से बिका। जिससे वन विभाग को अच्छी आमदनी हुई।

राजस्थान में महंगे दाम बिकता है बैतूल का महुआ

प्रदेश में सर्वाधिक महंगे दाम पर महुआ खरीदने वाले महुआ व्यापारी गेलेन्द्र राठौर ने बताया कि बैतूल जिले के महुए की राजस्था में सर्वाधिक मांग है। उनके परिवार में वर्षो से महुए का व्यापार हो रहा है। राजस्थान में बैतूल जिले का महुआ अन्य महुआ उत्पादक जिले के महुए से दो से तीन सौ रूपए क्विंटल महंगा बिकता है। श्री राठौर बताते है कि जिले में महुआ संग्रहण का कार्य अधिकतर आदिवासी वर्ग द्वारा किया जाता है जो महुआ बीनने के बाद साफ स्थान पर सुखाते है फिर घर के सामने मंडे पर रख देते है जो तेज धूप में सूखता रहता है और जल्दी खराब नहीं होता है इसलिए जिले के महुए की देशभर में डिमांड है। यदि वन विभाग महुआ संग्रहण के लिए प्रशिक्षण करवाए, सुविधाए उपलब्ध करवाए तो जिले के सागौन, तेंदूपत्ता के बाद महुए में भी अलग पहचान बना सकता है।

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