प्रबंधन का दावा- केवल आठ दिन का ही कोयला स्टॉक बचा है, पिछले 12 दिनों में आई सिर्फ 9 रैक

मयंक भार्गव

बैतूल १३ अक्टूबर ;अभी तक;  कोयला संकट की आहट बैतूल के सतपुड़ा थर्मल पावर स्टेशन में भी महसूस की जाने लगी है। यहां केवल आठ दिन का ही कोल स्टॉक बचा है। अगर इसमें और कमी आई तो युनिटों के बंद होने के कारण पश्चिमी ग्रिड में ब्लैक आउट का सबसे बड़ा खतरा पैदा हो सकता है। यह स्तिथि पावर कट की बड़ी त्रासदी की वजह बन सकता है। हालांकि प्रबंधन सब कुछ सामान्य बताकर, संकट से इंकार कर रहा है।

सूत्रों के मुताबिक सतपुड़ा थर्मल पावर सारणी के कोल हैंडलिंग प्लांट में केवल चार दिन का कोयला शेष है। हालांकि प्रबंधन इसे बढ़ाकर आठ दिन बता रहा है। लेकिन जानकार सूत्र इससे इनकार कर रहे है। पावर हाउस के जनसंपर्क अधिकारी देवेंद्र नागले के मुताबिक पावर हाउस के पास फिलहाल 54 हजार मैट्रिक टन कोयला है। रोजाना साढ़े सात से आठ हजार मैट्रिक टन की खपत के लिहाज से यह लगभग सात दिन का स्टॉक है। नागले ने बताया कि इसके अलावा प्रतिदिन एसईसीएल की कोयला खदानों से एक रैक कोयला भी पहुंच रहा है। जिससे कोयला संकट की समस्या नहीं है।

स्टैगर 4 फुट से नीचे नहीं जाते

सूत्र बता रहे है कि पावर हाउस जिस 54 हजार में टन कोयले की बात कर रहा है। वह हकीकत में सिर्फ 40 हजार मैट्रिक टन से भी कम है। जो पावर हाउस की सिर्फ 5 दिन की खुराक है। इस दावे की वजह यह है कि कोल हैंडलिंग प्लांट यानी सीएचपी में 10 से 20 मेट्रिक टन कोयला तो जमीन में ही पड़ा रहता है। जो कोयला उठाने वाले स्टैगर से उठता ही नहीं है। क्योंकि यह स्टैगर 4 फुट से नीचे जाते ही नहीं है। इसलिए 54 हजार में टन कोयले का पूरा इस्तेमाल पावर हाउस कभी कर ही नहीं सकता है।

कोयला आना हुआ कम

पावर हाउस के अधिकारी हर दिन एक रैक कोयला सारणी पहुंचने का दावा कर रहे हैं। लेकिन सूत्र बताते हैं कि पिछले माह सितंबर में कुल 13 रैक कोयला रेल मार्ग से मिला था। जबकि इस महीने 12 अक्टूबर को 9वी रैक ही पहुंची है। जबकि छिंदवाड़ा की खदानों से ट्रकों के जरिए हर दिन एक से डेढ़ हजार मैट्रिक टन कोयला मिल रहा है। बताया जा रहा है कि पहले ज्यादा युनिटों के चालू रहते हर महीने 120 रैक तक कोयला सारणी पहुंचता था। लेकिन पिछले छह महीनों में हर महीने 12 से 13 रैक ही कोयला सारणी को मिल रहा है। सूत्र का कहना है कि पावर हाउस की चालू 9 और 10 नवंबर इकाई को कोयला आपूर्ति करने वाले सीएचपी 4 में महज 20 हजार में टन कोयला है। जबकि सीएचपी 2 में भी 20 से 25 हजार में टन कोयला है। कोयले की कमी की वजह से बंकरों में भी कोयला नहीं डाल रहे हैं। इन बंकरों में भी 5 से 7 सौ मैट्रिक टन कोयला रखा जाता है।

जानकर बताते है कि किसी भी पावर हाउस में कम से कम 20 से 21 दिन का स्टॉक रहना चाहिए। पावर हाउस के पूर्व मुख्य अभियंता केके जैन मानते है कि यहां लोकल माइन है, इसलिए सप्लाई होती रहती है। इससे इमरजेंसी की संभावना कम है। यह कोल सप्लाई पर निर्भर है कि संकट है या नहीं। जबकि जनता यूनियन के नेता विलास महाले बताते है कि दो साल से यहां छह-सात दिन का ही कोल स्टॉक रहता है। यानी पवार हाउस हैंड टू माउथ चलता ही रहता है। कभी फ़ायनेंन्स की समस्या होती है तो कभी कोल की दिक्कत।

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