प्रसंग:भाजपा संगठन परिवर्तन दुखदाई किंतु परिणाम सुखदायी

7:05 pm or June 21, 2021
प्रसंग:भाजपा संगठन परिवर्तन दुखदाई किंतु परिणाम सुखदायी
महावीर अग्रवाल
      मंदसौर २१ जून ;अभी तक;     अभी भारतीय जनता पार्टी की नवीन कार्यकारिणी का मनोनयन किया गया इसमें पार्टी के वरिष्ठ तथा अति वरिष्ठ नेताओं के नाम नहीं है इसके साथ ही जो अपने आपको बड़ा नेता समझते हैं उनके नाम भी आपको दिखाई नहीं दे रहे होंगे और यह सब देख कर सभी के मन में यह प्रश्न पैदा होता है कि इन सब की उपेक्षा की गई है।
            किंतु किसी भी जीवित संगठन में इस प्रकार के परिवर्तन स्वाभाविक ही नहीं बल्कि इस प्रकार के परिवर्तन करना अनिवार्य भी है क्योंकि संपूर्ण प्रकृति परिवर्तन के सिद्धांत पर टिकी हुई है जिस प्रकार ऋतुऐ  आती जाती है दिन- रात होते हैं नदी में बाढ़ आती है फिर उतर जाती है वृक्षों पर नए पत्ते आते हैं पुराने पत्ते झड़ जाते हैं उसी तरह व्यक्ति समाज और संगठन इन तीनों में परिवर्तन होते रहने से यह प्राणवान होते हैं और इनमें नवशक्ति एवं नवलय का संचार होता है।
             जिस संगठनों में परिवर्तन स्वीकार नहीं होते और पुराने नेता एवं पदाधिकारी छत्रपतियों  की तरह जमे रहते हैं वहां  संगठन प्रगतिशील नहीं होता है और उसमें नवीन शक्ति का संचार भी नहीं होता और एक समय आता है कि ऐसे संगठन समाप्ति की ओर चले जाते हैं।
            जब संगठन में  परिवर्तन होता है और उसमें पुराने लोगों को केवल नाम मात्र का सम्मान मिलता है तो वह बिलबिला उठते हैं किंतु उन्हें यह समझना चाहिए कि जब आपका समय था तब आपने वह संपूर्ण समय अपने पुरुषार्थ के साथ लाभ -हानि, उतार- चढ़ाव, मान -अपमान एवं भाव -अभाव के बीच में संघर्ष किया  तथा प्रतिष्ठा प्राप्त की किंतु जीवन भर का ठेका तो हम अपने स्वयं के परिवार में भी नहीं उठाते हैं इसलिए प्रत्येक कार्यकर्ता को समय काल परिस्थिति तथा उम्र के अनुसार निवृत्ति की ओर जाने के लिए तैयार रहना चाहिए तथा नए लोग, नए ज्ञान ,नए उत्साह, एवं नए विचार के साथ पार्टी संगठनों में नव संचार का संचरण करते हैं इसलिए उन्हें मौका दिया जाने से  उक्त सभी वरिष्ठ कार्यकर्ताओं को नए कार्यकर्ताओं के लिए उत्साह पूर्ण  वातावरण का निर्माण करना चाहिए।
               यह शाश्वत सत्य है की हमारे मकान के  कमरे में रखी हुई वस्तु का स्थान परिवर्तन करने से भी परिवार में अनेक लोगों को कष्ट होता है किंतु राजनीति यह एक कठिनतर प्रकल्प  है और इसमें परिवर्तन सीधे-सीधे मान सम्मान को प्रभावित करने वाला होता है अतः कष्ट होना स्वाभाविक है किंतु परिवर्तन प्रकृति का नियम है एवं ईश्वर का विधान है ,यह मानकर इसको सहर्ष स्वीकार करना चाहिए तब ही संगठन नई मजबूतियों को प्राप्त करेगा और जिस संगठन को बंजर भूमि में बगीचा बनाकर  पुराने नेताओं तथा कार्यकर्ताओं ने अपने खून पसीने से सिचां हो तथा जब वह हरा भरा हो जाता है और उसमें नए फूल तथा कलियां मुस्कुराती है तो यह देख कर स्वाभाविक रूप से मन प्रसन्न हो जाता है ।
            संगठन एक परिवार की तरह होता है और परिवार के वरिष्ठ जन सदैव अपने बच्चों को आगे बढ़ता देख कर खुश होते हैं ठीक यही भाव  रखकर परिवर्तन को स्वीकार करना चाहिए।
रमेशचन्द्र चन्द्रे