प्रसिद्ध शोध संस्थान के व्यय पर ध्यान दे शासन

महावीर अग्रवाल
मन्दसौर २८ दिसंबर ;अभी तक; एशिया की  प्रसिद्ध शोध संस्थान जिसमे मध्यकालीन इतिहास खास तौर पर 17 वीं,18 वीं शताब्दी के इतिहास , नटनागर शोध संस्थान सीतामऊ मध्यप्रदेश शासन और सरकार से वित्त पोषित है पर क्या इन दिनो शासन के रुपयों का दुरुपयोग हो रहा है ? क्या शासन द्वारा प्रदत्त शोध वित्तिय सहायता को निजी और अनायास व्यय किया जा रहा है ? शासन के ध्यान आकर्षण हेतु  यह प्रस्तुत है ।
                             मामला देश विदेश के इतिहासकारों ओर शोध कर्ताओं से जुड़ा है जहाँ एशिया महाद्वीप में इतनी विशाल विशुद्ध ओर वृद्ध शोध संस्थान मन्दसौर जिले की धरोहर है । मन्दसौर जिले के सीतामऊ तहसील (छोटी काशी) में डॉ रघुवीरसिंह जी द्वारा स्थापित नटनागर शोध संस्थान जहाँ मध्यकालीन इतिहास विशेषतः 17 वीं ,18 वीं शताब्दि पर शोधकर्ताओं के लिए जो सामग्री यहाँ है वो शोधकर्ताओं का मानना है की एशियाई देशों में वो सामग्री और कही नही उपलब्ध है । शासन से यह संस्थान स्थापना 1979 से प्रति वर्ष शोध के लिए वित्तीयपोषित है । वर्तमान में भी राज्यशासन ने 1 करोड़ 21 लाख रुपये प्रदान किये है सूत्रों की माने तो अब यहाँ से अनियत किराये के बिलों को लगाया गया है , संस्था के नाम स्कार्पियो गाड़ी खरीद ली गयी है जो बीना संस्था के उपयोग के दिल्ली , जोधपुर, उदयपुर की यात्राओं में निजी हितों हेतु उपयोग हो रही है , वही गाड़ी ड्राइवर के वेतन का 45 हजार आहरण नियम विरुद्ध होना बताया जा रहा है । विज्ञप्ति , या जाहिर सूचनाओं के बीना ही कई अनियत कार्य किये जाने का हवाला दिया जा रहा है , वही इंदौर बैठे ऑडिटर के नाम अनियत वेतन और भत्तो का आहरण भी शासन के जाँच का विषय है । राज्यशासन द्वारा शोधकार्य हेतु प्रदत्त वित्तीय सहायता शोध कार्यो में व्यय न होकर निजी हितों में होना एक जाँच का विषय है ।