बच्चे उपदेशों से उतना नहीं समझते जितना आचरण से समझते हैं -जैनाचार्य श्री विजयराजजी म.सा.

महावीर अग्रवाल
मन्दसौर ७ नवंबर ;अभी तक; बच्चे फूल जैसे सुकुमार, प्रेम और पवित्र, मन के निश्छल, सरल और सच्चे होते हैं ये उनके नैसर्गिक गुण होते हैं, फिर ये बच्चे अमीरों के हो या गरीबों के, बच्चे बच्चे ही होते हैं अमीरों व गरीबों का भेदभाव उनमें नहीं होता वे सहज व स्वाभाविक होते हैं। बच्चों की पहली पाठशाला उनकी माँ होती है, जो उन्हें संस्कार देती है, माँ संस्कारी होगी तो बच्चों में सहज संस्कारों का अवतरण होगा, असंस्कारी माता-पिता अपने बच्चों को संस्कारवान नहीं बना सकते, संस्कारों की शुरूआत माता-पिता से होती है, बच्चे उपदेशों से उतना नहीं समझते जितना आचरण से समझते हैं, इसी लिहाज से माता-पिता को अपना हर कार्य उठना, बैठना, खाना-पीना, सोना-जगना, धर्म ध्यान समय पर व्यवस्थित और सावधानी पूर्वक करना चाहिए, ताकि आज के बच्चे कल के अच्छे माता-पिता बन सके। थोड़ी सी असावधानी न केवल अपना जीवन बल्कि बच्चों के जीवन के लिये मुसीबतों का कारण बना सकती है।
                   ये विचार शास्त्री कॉलोनी स्थित नवकार भवन में विराजित जैनाचार्य श्री विजयराजजी म.सा. ने ‘‘कैसे दें संस्कार’’ विषयक परिचर्चा को प्रसारित करते हुए कहे। आपने कहा-जो ब्रह्म मुहूर्त में सोते रहते हैं, वे ही ज्यादा दुःखी होते है, घड़ी के रात में दस के टंके सुनना नहीं और पांच के टंके सोना नहीं, जल्दी सोना और जल्दी उठना, उसमें सूर्योदय से कम से कम एक घण्टे पहले उठकर आत्मचिंतन और आत्म स्वाध्याय करना चाहिए, देर से उठने वाले दिन भर आलस्य से जकड़े रहते है। उन्हें शांति नहीं मिलती, सुख चाहिए तो रात में जगना छोड़ दे और शांति चाहिए तो दिन में सोना छोड़ दे, रात विश्राम के लिये होती है, दिन श्रम के लिए। जो प्रकृति के विरूद्ध चलते हैं, वो सुखी नहीं रहते। हर माता-पिता अपनी दिनचर्या नियमित बनाये, दिनचर्या ही जीवनचर्या बनाती है। उसी से जीवन चरित्र बनता है।
                 आचार्य श्री ने कहा-प्रकृति हर बच्चे को उसका भाग्य तथा योग्यता देकर भेजती है, हमें तो बिना राग-द्वेष के उनमें गुणग्राही प्रकृति का बीजारोपण करना है। याद रखें-आप यानि माता-पिता बच्चों के ट्रस्टी है मालिक नहीं, वे आपके प्रदत्त संस्कारों से स्वयं का जीवन बनाते हैं। बच्चा कोई गलती करें तो फिक्र न करें बल्कि उसको यह मालूम होना चाहिए वह जो कर रहा है उससे उसको कोई नुकसान तो होने वाला नहीं है, एक बार की गलती उसे आगे के लिये जागरूक व सावधान करती है। उसकी भावना केा, विचार को, तर्क को धैर्य से सुनें, समझें फिर योग्य समाधान करें। पहले उसकी प्रशंसा करें फिर शांति व प्रेम से अच्छा सुझाव देकर उसका उत्साहवर्धन करें, उपालम्य और शिकायत की भाषा न बोलें, बच्चों को पूरा समय देना चाहिए ताकि उन्हें आप समझ सके वे आपको। अगर उन्हें स्नेह और प्यार की ऊष्मा घर में नहीं मिलेगी तो वे बाहर किसी गलत मार्ग को चुन लेंगे जिसकी जिम्मेदारी माता-पिता की होगी। आचार्य श्री ने कहा अपने बच्चों को किसी के जैसा बनाने का प्रेशर नहीं डालना चाहिए यह उनके स्वविवेक से लिया गया निर्णय होता हैं। दबाव में बच्चे अपने को बोझिल समझते हैं, उन्हें हिताहित की समझाईश देते रहना चाहिए, बच्चांे को मानवता का महत्व समझाये, उनमें रूढ़िगत धर्म के अंध विश्वासों के बीज न बोएं, दया, करूणा के भावों में प्रवीण बनाये, अच्छे कार्यों की प्रशंसा, प्रोत्साहन व पुरस्कार करते रहे। आपकी यान माता-पिता की एक प्यार भी मुस्कान उन्हें मिलती रहेगी तो उनकी थकान भी मिटेगी और उज्जवल भविष्य को आभा भी मिलेगी। जल्दबाजी में हर काम बिगड़ते है, इसलिये जल्द बाजी से बचें। आशावादी रहे।

 


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