बालाघाट के चिन्नौर चावल को मिला जी.आई. टैग, मध्यप्रदेश की प्रथम जी.आई. टैग कृषि जिन्स “बालाघाट चिन्नौर चावल”

आनंद ताम्रकार

बालाघाट ३० सितम्बर ;अभी तक; चिन्नौर सुगंधित चावल की न सिर्फ बालाघाट जिले में बल्कि समूचे देश में मांग रहती है। बालाघाट जिले मे चिन्नौर सुगंधित धान परम्परागत तरीके से  प्राचीन समय से उगाई जा रही है। अब बालाघाट जिले की चिन्नौर चावल को जी.आई. टैग मिल गया है। यह मध्यप्रदेश की कृषि क्षेत्र की पहली जिंस है, जिसे जी.आई. टैग मिला है। मध्यप्रदेश शासन बालाघाट जिले की चिन्नौर को एक जिला एक उत्पाद के अंतर्गत व्यवसायिक तौर पर प्रमोट कर रहा है। जी.आई. टैग मिलने से बालाघाट जिले को एक नई पहचान मिल गई है।
              चिन्नौर का चिकनाई युक्त, नोकदार – चावुर, सुगंधित चिन्नौर का चावल अपने नाम में ही अपनी विशेषता रखता है। चिन्नौरर के दाने के शीर्ष भाग की आकृति तलवार की नोक के समान है। इस चावल की किस्म का स्वाद बहुत ही अनोखा है। चिन्नौरर चावल से बनी खीर में मलाईदार लाजवाब स्वाद होता है और इसमें किसी भी तरह के स्वाद को शामिल करने की आवश्यकता नहीं होती है। पका हुआ चावल ठंडा होने के बाद भी नरम रहता है और प्रकृति में थोड़ा चिपचिपा होता है। चिन्नौर का चांवल सुपाच्य होने के कारण ज्यादा रूचि के साथ खाया जाता है।
             बालाघाट जिले के गांवों में लोग अनेक वर्षो से चिन्नौर धान की खेती कर रहे है। परंपरागत तरीके से चली आ रही खेती मे पर्याप्त उत्पादन नही मिल पा रहा था। उत्पादन प्रभावित होने के साथ ही चिन्नौर के साथ अन्य सुगंधित व असुगंधित धान मिश्रित हो गऐ थे। गाढ़ी मेहनत कर उत्पादित चिन्नौर के मार्केटिंग की सही व्यवस्था न हो पाने के कारण बालाघाट के लोग कम कीमत में ही अपनी उपज बेचने में मजबूर रहतें थे। परन्तु जी.आई. का प्रमाण पत्र मिल जाने पर बालाघाट के चिन्नौर की पहचान राष्ट्रीय एवं अन्तेर्राष्ट्री य स्तर पर हो जायेगी। वर्तमान समय में बाहर के बाजार में इसकी बहुत अधिक मांग है जिसके कारण इसका दाम अन्य धान की तुलना में बहुत ज्यादा रहता हैं। चिन्नोर का चावल खाना एवं खिलाना प्रतिष्ठा का प्रतीक माना जाता है। जी.आई. टैग मिलने से अन्तर्राष्ट्रीय बाजार में इसकी मांग बढ़ेगी और किसानों को अच्छा मूल्य मिल सकेगा ।
             बालाघाट जिले में लगभग 2700 किसानों द्वारा 1525 हेक्टेलयर में चिन्नौरर धान की पाराम्पलरिक रूप से खेती की जाकर अनुमानित 1980 टन धान का उत्पाकदन लिया जा रहा है, जिससे लगभग 1000 टन चिन्नौीर चावल का उत्पासदन कर विश्वा स्तिर पर विपणन किया जाता है।
             दक्षिण पूर्व एशिया में मीठी महक वाले तथा छोटे दाने वाले चांवल बेहद लोकप्रिय हैं। साथ ही धान की अन्य किस्मों के चोकर (राईस ब्रान) में तेल का प्रतिशत 18-19 प्रतिशत है जबकि चिन्नौर धान के चोकर में तेल का प्रतिशत 20-21 प्रतिशत है, और इसलिये चांवल की भूसी का तेल (राईस ब्रॉन आईल) भी एक मूल्य वर्धित उत्पाद है।
               बालाघाट जिले के चिन्नौर की जी.आई. टैगिंग के लिए बालाघाट चिन्नौर उत्पादक सहकारी समिति मर्यादित कायदी, कृषि महाविद्यालय, कृषि विज्ञान केन्द्र , कृषि विभाग एवं जिला प्रशासन प्रयासरत था। वर्तमान परिदृश्य में भारत सरकार तथा राज्यह सरकार द्वारा ”एक जिला एक उत्पाद” के अंतर्गत बालाघाट जिले से चिन्नौर धान को चुना गया है जिसका फायदा सीधे जिले के कृषकों को होने वाला है।
क्या है जी.आई. टैगिंग, इसका महत्व और इसके लाभ
              यह भारत में भौगोलिक संकेतों को कानूनी सुरक्षा प्रदान कर निर्यात को बढ़ावा मिलने से  उत्पादकों की आर्थिक समृध्दि को बढावा देता है। यह दूसरों के द्वारा पंजीकृत भैगोलिक संकेतकों के अनाधिकृत उपयोग को रोकता है। यह अन्य विश्वो व्यापार संगठन के सदस्य देशो में कानूनी सुरक्षा प्राप्त करने में सक्षम बनाता है। इससे अंतर्राष्ट्रीतय बाजार में उत्पाद की ब्राण्ड वैल्यु ज्यादा हो जाती है जिससे बाजार मूल्य में कई गुना वृद्धि होती है। चिन्नौ।र उत्पादक किसानों के हितों की रक्षा करना। चिन्नौ र उत्पादक कृषकों की विरासत को संरक्षित करने के लिए मिलावट के खिलाफ संरक्षण। चिन्नौर ग्राहकों की क्षेत्रीय, देशव्यापी व अन्तर्राष्ट्रीय मांग को पूरा करने के लिए इसके उपज को बढ़ावा मिल सकेगा।
             जिले में चिन्नौ र धान आगामी समय में रकबा बढ़ाने के लिये जिला प्रशासन व कृषि महाविद्यालय एवं कृषि विज्ञान केन्द्रत के द्वारा कृषकों की प्रोत्साआहन किया जा रहा है। जिसके परिपेक्ष्य् में चिन्नौदर उत्पािदक कृषकों का FPO गठन किया गया है। जिसके द्वारा बीज का संवर्धन एवं उपार्जन किया जाकर चिन्नौकर धान के ब्राडिंग के साथ बीज वितरण किया जावेगा, जिससे जिले के अधिकाशं कृषकों के बीज चिन्नौ र धान का उत्पा दन कर लाभान्वित किया जावेगा।
एक छोटे सी पहल ने दिलाई अन्तर्राष्टीय पहिचान
                  चिन्नौर चावल की खुशबू  को पहचान दिलाये जाने की पहल करते हुए जिला प्रशासन ने कृषि महाविद्यालय बालाघाट, कृषि विज्ञान केन्द्र बड़गांव बालाघाट एवं किसान कल्याण तथा कृषि विकास विभाग को समन्वित जवाबदारी सौपी थी। चिन्नौर की खेती के माध्यम से किसानों के जीवन में बदलाव लाने के लिए चिन्नौर का जी.आई. सूचक पंजीकरण (जियोग्राफीकल इंडीकेशन) कराने का जिम्मा सौंपा  गया था। इन संस्थानो के वैज्ञानिको तथा अधिकारियों के मार्गदर्शन में चिन्नौर का जैविक तरीके से उत्पादन कर अब इसे ब्रान्डेड भी किया जायेगा। कृषक समूहों को चिन्नौर की खेती से जोड़कर इसकी मार्केटिंग की भी व्यवस्था की जाएगी।
बालाघाट का चिन्नौर चावल ब्रांडेड होने के बाद अब ऊचें दामों पर सुगंधित चिन्नौर के नाम से बिकने लग जाऐगा। गांवो के जैविक चिन्नौर उत्पादन समूहों को चिन्नौर धान की खेती से जोड़ा गया है, इसका सकारात्मक परिणाम सामने आने वाला है। बालाघाट जिले के कलेक्टर श्री गिरीश कुमार मिश्रा की मंशानुसार कृषि महाविद्यालय बालाघाट के अधिष्ठाता डॉ. एन.के. बिसेन, वैज्ञानिक डॉ. उत्तम बिसेन, डॉ. विक्रम सिंह गौर, डॉ. शरद बिसेन एवं अनुभवी वैज्ञानिकों की टीम, डॉ.आर.एल. राउत वरिष्ठ वैज्ञानिक एवं प्रमुख कृषि विज्ञान केन्द्र बड़गांव बालाघाट एवं श्री सी.आर. गौर उपसंचालक किसान कल्याण एवं कृषि विकास विभाग बालाघाट चिन्नौर की खेती को व्यावसायिक स्वरूप देकर पूरे देश में चिन्नौर की महक फैलाने के प्रयास कर रहे है। जिसे प्रसंस्कृत और पैकिंग कर सुगंधित चावल के रूप में बाजार में लाया जाएगा। चिन्नौर धान की खेती को बढ़ावा दिये जाने से बालाघाट में जैविक चिन्नौर उत्पादक किसानों की आर्थिक स्थिति बदलेगी। ये सभी वे किसान है, जिनके परिवार से चिन्नौर की खेती कर रहे है परन्तु प्रसंसकरण पैकेजिंग और मार्केटिंग की व्यवस्था ना हो पाने के कारण इन्हे उपज का सही दाम नही मिल पा रहा था। आसपास के व्यापारियों व बिचैलियों को कम दर पर ये ग्रामीण कृषक अपना चिन्नौर धान और चावल बेचने के लिए मजबूर हुआ करते थे। प्रशासन द्वारा दिए जा रहे सहयोग और प्रोत्साहन के बाद चिन्नौर चावल लगभग 100 रू. प्रति किलो बिक रहा है। प्रशासन आने वाले समय में इन्हे हर संभव सहयोग प्रदान करता रहेगा।
इस उल्लेखनीय उपलब्धि में डॉ. जी.के. कोतू अधिष्ठाता कृषि महाविद्यालय बालाघाट तथा उनकी टीम में शामिल डॉ उत्तम सिंह बिसेन, डॉ विक्रम सिंह गौर, डॉ. शरद बिसेन, डॉ आर.एस. सोलंकी, डॉ. एन.के. बिसेन आदि का अभूतपूर्व सहयोग रहा है। कृषि विज्ञान केंद्र बालाघाट में पदस्थ कृषि वैज्ञानिक डॉ.आर.एस. राऊत,  श्री सी.आर. गौर उप संचालक किसान कल्याण तथा कृषि विकास बालाघाट, श्री सी.बी. देशमुख उद्यानिकी उद्यानिकी विभाग बालाघाट आदि इस उपलब्धि में विशेष उल्लेखनीय योगदान दिया है। शासन स्तर पर कृषि उत्पादन आयुक्त मध्यप्रदेश शासन श्री शैलेन्द्र सिंह,  श्री अजीत केसरी अपर मुख्य सचिव, मध्यप्रदेश शासन, किसान कल्याण तथा कृषि विकास विभाग तथा श्रीमती प्रीति मैथिल नायक संचालक, किसान कल्याण तथा कृषि विकास भोपाल के अभूतपूर्व सहयोग एवं मार्गदर्शन में यह उपलब्धि हासिल हुई है।