बुंदेलखंड की डायरी  बेबस  बुनकर और आत्म निर्भर भारत 

7:25 pm or June 29, 2020
बुंदेलखंड की डायरी  बेबस  बुनकर और आत्म निर्भर भारत 

 (रवीन्द्र व्यास )

 ” हमारे पुरखों ने हमें स्वावलम्बी बनाने पर जोर दिया था | गाँधी जी भी  स्वावलम्बी भारत को साकार करना चाहते थे इसीलिए उन्होंने गाँव के विकाश और कुटीर उद्योगों की बात की | असल में हर देश और समाज की परिस्थितियां अलग अलग होती हैं | गांधी जी ने देश की इन परिस्थितियों को  बेहतर तरीके से जाना और समझा था | आजादी के 73  सालों तक गांधी जी और हमारे मनीषियों के इस अनुभवी विचारों को दफ़न कर दिया गया | परिणामतः गाँव कमजोर होते गए लोगों के रोजगार छिनते गए ,और गाँव से लोग पलायन को मजबूर हुए | 73 वर्ष बाद स्वावलंबन एक नए रूप मेंसामने  आया है ,अब  देश के प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी ने आत्म निर्भर भारत की बात कह रहे  है | बुंदेलखंड जो कभी स्वावलम्बी बनाम आत्मनिर्भर हुआ करता था ,आज निराश्रित सा है | आत्मनिर्भर भारत की बात तो कही जा रही है पर क्या इससे बुंदेलखंड के परम्परागत उद्योगों को को शुरू किया जा सकेगा यह एक बड़ा सवाल है |

                       अतीत को देखें तो बुंदेलखंड में बुनकरों को सबल और सक्षम बनाने के लिए गांधी जी ने 100 वर्ष पहले  महोबा जिले के जैतपुर में  खादी  केंद्र की स्थापना की थी |  देश  में कलकत्ता के बाद दूसरा खादी केंद्र जैतपुर (बेलाताल) में महत्मा गांधी ने खोला था | बुंदेलखंड में एक बड़ी आबादी बुनकरों की थी  जो अपने हथकरघा से अपने और अपने परिवार  का जीवन यापन करते थे | जेतपुर (बेलाताल) का यह केंद्र  बुंदेलखंड के बुनकरों के  जीवन में एक नव प्रकाश ले कर आया था | प्रकाश की यह किरण आजादी मिलने के बाद से  ही धीरे धीरे मंद होने लगी |   सरकारी आंकड़े बताते हैं की देश में लगभग 43 लाख बुनकर हैं , जिनमे अकेले बुंदेलखंड इलाके में यह आंकड़ा 3 लाख 48 हजार से ज्यादा बताया जा रहा है | एक हथकरधा से करीब १० लोगों को रोजगार मिलता था बिना तेल पानी और बगैर  बिजली के चलने वाले इस उद्योग की महिमा कभी दुनिया भर में निराली थी | जानकार बताते हैं की दुनिया का 85 फीसदी हथकरधा वस्त्रो का उत्पादन केवल भारत में होता था | पावर लूम  और कपड़ा  मिलों के जाल में यह उद्योग ऐसा नष्ट हुआ की बुंदेलखंड में गिने चुने बुनकर ही इस कला को जीवित बनाये हुए हैं |

                           80 -90 के दशक तक बुंदेलखंड के छतरपुर ,हरपालपुर (सरसेड )महोबा (बेलाताल )बांदा (अतर्रा-खुरहंड )टीकमगढ़ ,निवाड़ी , दमोह ,झाँसी (रानीपुर) जैसे अनेकों स्थानों पर बुनकर कपडे बनाने और बेचने का कारोबार करते रहे |  झाँसी जिले के मऊरानीपुर के हेंडलूम वस्त्र भारत भर में बड़ी शान से ना सिर्फ बिकते थे बल्कि इनको लोग हाथों हाँथ लेते थे | दरअसल हथकरधा कपड़ों को  बनाने के लिए जिस ताने बाने की बात की जाती है वह जिंदगी के ताने बाने से भी जुडी है | यह वह ताना बाना था जिसमे बुनाई ,कड़ाई, गोला बनाना ,कंघी भरना ,सूत खोलना ,ताना बनाना ,गाँठ लगाना ,कपडे धोना , प्रेस करना ऐसे तमाम कार्य थे जो इसके साथ जुड़े रहते थे |  मानव जीवन के इस तने बाने को सरकार की नीतियों ने ऐसा छिन्न भिन्न किया की , गाँव की समृद्धि की यह डोर ही टूट गई |

                   जैतपुर (बेलाताल) के बुनकर  के हाथ से बनी खादी देश भर  में तो मशहूर थी ही , इससे मिलता था  और लोगों को भी रोजगार | दरजी . धोबी , रंगरेज ,भी इससे पलते थे | बुनकरों के साथ ये भी बदहाल हो गए |गांधी के सपने को किसी और ने नहीं बल्की उनके ही अनुयायियों ने तोड़ डाला | जिन बुनकरों को गाँधी के चरखा और हथकरधा ने जीवन का आधार दिया था वो अब टूट गया है |

                    ८० के दशक तक जैतपुर की बुनकर बस्ती आबाद रहती थी|यहाँ के बुनकर गाँधी जी द्वारा स्थापित खादी उत्पत्ति केंद्र में खादी के कपडे बना कर बेचते थे  |८० के बाद से यहाँ की ये बस्ती जो वीरान होना शुरू हुई तो अबतक होती ही जा रही है | यहाँ के दो सौ से ज्यादा बुनकर परिवार यहाँ खादी के कपडे बनाते थे | आज ये सिर्फ किस्से- कहानियों की बात हो गई है | यहाँ के बुनकरों ने हाथ करघा से तौबा कर लिया है | यहाँ तक की अपने करघे उन्होने कबाड़ में फेंक दिए हें | वजह साफ़ है की उनके श्रम का इतना भी मूल्य नहीं मिलता था की वो अपना और अपने परिवार का पेट पाल सकें | हालातों से हताश हो कर यहाँ के लोगों ने पलायन कर गए | बुनकर बस्ती का हर जवान पेट की आग बुझाने दिल्ली ,पंजाब ,गुजरात में मजदूरी करने को मजबूर है |

                      उन सुनहरे दिनों को याद कर ये लोग आज भी भावुक हो जाते हैं , उन्हें  आज भी याद हें अपनी गलियों के वो दिन जब पूरे मोहल्ले में चरखों  और हाथ करघों की आवाज गूंजती रहती थी | मोहल्ले में खरीददारों की भीड़ लगी रहती थी | इनके पास अपने ही रिश्ते दारों को पानी पिलाने तक की फुर्सत नहीं हुआ करती थी | वक्त बदल गया अब इनके पास वक्त ही वक्त है , इनके अपने भी अब इनके पास नहीं हें | बेटों ने पैसा भेज दिया तो दो जून की रोटी का जुगाड़ हो गया नहीं तो ——–ठीक है |

बुंदेलखंड  के इस सबसे बडे खादी उत्पत्ति केंद्र  से बुंदेलखंड के बुनकरों का जुड़ाव ठीक वेसा ही था जैसे जीवन का सांसों से | बुंदेलखंड इलाके के बुनकरों को ये केंद्र कच्चा सूत उपलब्ध कराते थे उससे ये लोग बारीक सूत बनाकर खादी का कपड़ा बनाते थे | आज यहाँ रायबरेली के केंद्र से कपास के मोटे सूत ही आते हें , यहाँ  संचालित कुछ चरखों से सिर्फ महीन सूत ही बनता है |

                                            ये कहानी सिर्फ बेलाताल भर की नहीं है बल्कि इसी तरह के हालातों से झांसी जिले का रानीपुर केंद्र और छतरपुर जिले का सरसेड (हरपालपुर) भी जूझ रहा है | रानीपुर के हथकरधा वस्त्र उद्योग से इस इलाके के दो लाख से भी ज्यादा लोगों की रोजी रोटी चलती थी | आज यहाँ भी सन्नाटा पसरा है , उस पर लाक डाउन ने जीवन तो सुरक्षित किया पर जीने के आधार पर ब्रेक लगा दिया |

छतरपुर जिले के सरसेड़ गॉव के बुनकरों  की दशा भी कुछ ऐसी ही है | पहले कभी यहाँ 150 से ज्यादा हथकरघा  चलते थे आज सिर्फ दो घरों में ये चल रहे हैं |सरसेड़ गॉव और आस पास के गाँवों के   बुनकरो  के लिये सरकार ने सरसेड में एक भवन भी बनवाया था | हथकरघा उद्योग को बढ़ावा देने के  पावरलूम मशीने लगाने की बात कही थी | वायदे तो होते ही तोड़ने के लिए मशीन आज तक नहीं लगी |

” बुंदेलखंड में एक कहावत मशहूर है दूबरे और दो असाड़ ” ऐसा ही कुछ हाल बुंदेलखंड के बुनकरों का  लॉकडाउन के दौरान  हुआ | शासन से इन  लोगों को लॉक डाउन में कोई मदद ना मिलने से ये कर्ज और बेबसी के जाल में फंस कर रह गए हैं |

                                        ये देश की वो तस्वीर है जो बताती है की जिस गांधी की माला का जाप कर नेताओं ने वर्षों तक देश में राज किया और कर रहे हें , उन्होने ही गांधी के चरखों को दफनाने में कितना अहम् किरदार निभाया है | अब सरकार आत्म निर्भर भारत की बात कर रही है , बुंदेलखंड में इस तरह के अनेकों कुटीर उद्यम  हैं  जो दफ़न हो चुके हैं सही नीति और नियत से लोगों के रोजगार का एक बड़ा  आधार बन सकते हैं |  लोकल के वोकल का नारा देना तो आसान है पर जमीं पर क्रियान्वयन की जिम्मेदारी जिनके कन्धों पर है वे इसमें कितनी मदद करते हैं | बुनकरों के कपडे खरीदना शासकीय तौर पर अनिवार्य कर दिया जाए तो तात्कालिक रूप से ही एक बड़ा परिवर्तन देखने को मिल सकता है | 

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